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इन पाँच फ़ेमस शायरों को 2022 में ज़रूर पढ़ें

इन पाँच फ़ेमस शायरों को 2022 में ज़रूर पढ़ें

उर्दू अदब की दुनिया में शायर और शायरी का मुकाम हमेशा से आला रहा है। अपने दिल के हाल को बयान

करने में शायरों ने कई उम्दा शेर कहे हैं जिन्हें हम और आप अपनी लाइफ़ के भी क़रीब पाते हैं। अपना मिज़ाज दो जुमलों में ज़ाहिर करने के लिए इंसान शेर तलाशता है। ये कहना किसी हालत में ग़लत नहीं होगा

कि उर्दू शायरी की ज़बान ही आदमी की दिली ज़बान है।

उर्दू शायरी की दुनिया से रिश्ता रखने वाले लोग इस तरह इस रस में डूब चुके होते हैं कि वो हर हाल-हालात पर

किसी शायर का शेर पेश कर ही देते हैं।

आप भी अगर शायरी की दुनिया से हैं या उस दुनिया का हिस्सा होना पसन्द करते हैं तो अपनी जिंदगी में इन कुछ ख़ास शायर/शायरात को पढ़ने में बिलकुल देर न करें।

 

1. इरफ़ान सिद्दीक़ी :- इरफ़ान सिद्दीक़ी उर्दू अदब के जाने पहचाने नाम हैं। उर्दू शायरी में इन्होंने बहुत ऊँचा मुकाम हासिल किया है और बड़ी से बड़ी बात को इतनी आसानी से कह गुज़रते हैं की पढ़ने/सुनने वाले इनके

शेर बाई हार्ट याद रखते हैं। इरफ़ान साहब ज़ेहनी शायरी करने में अव्वल थे। उन्होंने अपने शायरी से इंसानी फ़ितरत को बख़ूबी दर्शाया है। इरफ़ान साहब की शायरी दुनिया में कंट्रास्टिंग एलिमेंट्स बख़ूबी देखने को मिलते हैं। वो इंसानी फितरत को खंगालने के बाद उसकी गहरी समझ को आसान कर के अपनी शायरी में परोसते हैं।

इरफ़ान कहते हैं :-

होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है।
रंज कम सहता है ऐलान बहुत करता है।।

 

इनके शेरों से हर इंसान ख़ुद का तअल्लुक़ बख़ूबी महसूस कर पाता है। इरफ़ान साहब के चुनिंदा शेरों का

इकलौता ठिकाना “;होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है”; है जिसे रेख़्ता पब्लिकेशन ने इरफ़ान के दीवानों के लिए छापा है। साथ ही साथ इरफ़ान की कई इ-बुक्स भी आप रेख़्ता वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।

2. जमाल एहसानी:- जमाल एहसानी नए ज़माने के शायरों में शुमार इसलिए किये जाते हैं क्यों कि जमाल साहब ने अपनी शायरी से कई रूढ़िवादी सोचों को तोड़ने की कोशिश की है। जमाल के कलामों में कोशिश रही कि वह परम्परा और एस्टेबलिशड ट्रेडिशन के ख़िलाफ़ लिख सकें। अपने वक़्त के बदलते हुए समाज को जमाल साहब ने उर्दू शायरी में जज़्ब किया है। उनकी तहरीरें हमारे सामने समाज का आईना दिखाती हैं, जो

उनके वक़्त की दास्तान को क़ैद करता है। उदासी की लहजे में जमाल के शेर भी खिलते नज़र आते हैं।

वे कहते हैं:

उसी मक़ाम पे कल मुझको देख कर तन्हा
 बहुत उदास हुए फूल बेचने वाले
 
इक सफ़र में कोई दो बार नहीं लुट सकता
अब दोबारा तिरी चाहत नहीं की जा सकती 
 

जनाब जमाल एहसानी के कलाम का इन्तिख़ाब रेख़्ता नुमाइंदा कलाम सीरीज़ द्वारा छापी गई किताब “अकेलेपन की इन्तिहा”  में देखा जा सकता है। उनकी शायरी से वाक़िफ उनकी साफ़गोई को ख़ूब सराहते हैं।

 

3. इशरत आफ़रीन :- उर्दू अदब में औरतों ने भी अपना मक़ाम बेहतरी से पाया है। इशरत आफ़रीन ने औरतों के

लिए अदब के ज़रिये कई लड़ाइयाँ लड़ी। इशरत की शायरी में स्त्री भावनाएँ मुखर होकर सामने आती हैं और उनकी शायरी औरतों के हक़ में अपनी आवाज़ बुलन्द करती है। वह नाज़ुक माने जानी वाली लड़कियों के

मज़बूत और दीगर होने की बात अपनी शायरी में उकेरती हैं। पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए इशरत की शायरी नए ज़माने की लड़कियों की पैरवी करती है और उनके हाल–ए–दिल से रूबरू कराती है।

वह कहती हैं:

वो जिसने अश्कों से हार नहीं मानी
किस ख़ामोशी से दरिया में डूब गई

अपने हुनर और तहज़ीब के साथ साथ बदलाव की सोच रखने वाली इशरत अमेरिका में रहते हुए भी उर्दू शायरी की ख़िदमत में जुटी हुई हैं। लड़कियों के मन की बात, उनकी सामाजिक लड़ाइयों, और उनके एंबीशंस को अपनी शायरी में बख़ूबी जगह दी है। आफ़रीन की किताब “एक दिया और एक फूल”; आप रेख़्ता पब्लिकेशन से आराम से हासिल कर सकते हैं।

4. फ़रहत एहसास :- फ़रहत साहब मौजूदा उर्दू शायरी के पहली सफ़ में आने वाले शायर हैं जिनकी शायरी सीधे दिल को छूती है। फ़रहत साहब हमेशा ही इंसानियत के मज़हब की पैरवी अपनी शायरी में करते हुए नज़र आते हैं । फ़रहत साहब मॉडर्न और परंपरा का मिश्रण अपनी शायरी में यूँ करते हैं जिससे किसी भी उम्र का उर्दू अदब का दीवाना उनकी शायरी के गिरफ़्त में आ जाए और फिर वहीं बसने की इच्छा जताए। फ़रहत साहब की शायरी अपने आप में एक फ़लसफ़ा है जिससे आपको उन्हें ज़रूर पढ़ना चाहिए। ज़िन्दादिली और अपनी धुन में रहने वाले फ़रहत एहसास कहते हैं :-

 

मिट्टी की ये दीवार कहीं टूट न जाये,
रोको कि मेरे ख़ून की रफ़्तार बहुत है

       

अपने कलाम और अपने विचारों से औरतों के हाल को भी उसी साफ़गोई के साथ बयाँ करने वाले फ़रहत एहसास की कई किताबें जिन्हें रेख़्ता पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है जैसे :- “क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा” .

5. शाहीन अब्बास :- उर्दू शायरी में ख़ूबसूरती और फक्कड़पन को शाहीन अब्बास ने कुछ इस कदर मिलाया है जिससे वह मॉडर्न लाइफ़ की कशिशों को बेहद करीबी ढंग से पेश करते हैं। उनकी शायरी उनके मिज़ाज की ही तरह आज़ाद है। इश्क़, क़यामत, एक्सिस्टेंस से सवालों से खेलती हुई  शाहीन अब्बास की शायरी अपने आप में एक अलाहेदा रंग लाती है, जिससे पढ़ने सुनने वाला एक अलग दुनिया की सैर कर आता है।

शाहीन अब्बास कहते हैं :-

बनते बनते अपने पेच-ओ-ख़म बने ,
तू बना फिर मैं बना  फिर हम बने
 
एक आँसू था गिरा और चल पड़ा
एक आलम था सो दो आलम बने

 

मौजूदा दौर के रिश्तों के महीन धागों को शायरी की शक्ल में ढालने वाले शाहीन अब्बास आज के लोगों के लिए नसीहत और समझ का काम करते हैं। उनकी शायरी के मुख्तलिफ़ मजमुए शाया हुए हैं जिनमें सबसे ज़रूरी रेख़्ता पब्लिकेशन द्वारा लाया गया “शाम के बाद कुछ नहीं” है जो उनके शायरी में मौजूद सभी रंगों को एक जगह ले आता है।

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