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Murdahiya

Dr. Tulsiram

Rs. 395 Rs. 352

‘मुर्दहिया’ हमारे गाँव धरमपुर (आज़मगढ़) की बहुद्देशीय कर्मस्थली थी। चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते वहीं से गुज़रते थे। इतना ही नहीं, स्कूल हो या दुकान, बाज़ार हो या मन्दिर, यहाँ तक कि मज़दूरी के लिए कलकत्ता वाली रेलगाड़ी पकड़ना हो, तो भी मुर्दहिया से ही गुज़रना पड़ता... Read More

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Description

‘मुर्दहिया’ हमारे गाँव धरमपुर (आज़मगढ़) की बहुद्देशीय कर्मस्थली थी। चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते वहीं से गुज़रते थे। इतना ही नहीं, स्कूल हो या दुकान, बाज़ार हो या मन्दिर, यहाँ तक कि मज़दूरी के लिए कलकत्ता वाली रेलगाड़ी पकड़ना हो, तो भी मुर्दहिया से ही गुज़रना पड़ता था। हमारे गाँव की ‘जिओ-पॉलिटिक्स’ यानी ‘भू-राजनीति’ में दलितों के लिए मुर्दहिया एक सामरिक केन्द्र जैसी थी। जीवन से लेकर मरन तक की सारी गतिविधियाँ मुर्दहिया समेट लेती थी। सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुर्दहिया मानव और पशु में कोई फ़र्क़ नहीं करती थी। वह दोनों की मुक्तिदाता थी। विशेष रूप से मरे हुए पशुओं के मांसपिंड पर जूझते सैकड़ों गिद्धों के साथ कुत्ते और सियार मुर्दहिया को एक कला-स्थली के रूप में बदल देते थे। रात के समय इन्हीं सियारों की ‘हुआँ-हुआँ’ वाली आवाज़ उसकी निर्जनता को भंग कर देती थी। हमारी दलित बस्ती के अनगिनत दलित हज़ारों दु:ख-दर्द अपने अन्‍दर लिए मुर्दहिया में दफ़न हो गए थे। यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती, उसका शीर्षक ‘मुर्दहिया’ ही होता।
मुर्दहिया सही मायनों में हमारी दलित बस्ती की ज़‍िन्‍दगी थी।
ज़माना चाहे जो भी हो, मेरे जैसा कोई अदना जब भी पैदा होता है, वह अपने इर्द-गिर्द घूमते लोक-जीवन का हिस्सा बन ही जाता है। यही कारण था कि लोकजीवन हमेशा मेरा पीछा करता रहा। परिणामस्वरूप मेरे घर से भागने के बाद जब ‘मुर्दहिया’ का प्रथम खंड समाप्त हो जाता है, तो गाँव के हर किसी के मुख से निकले पहले शब्द से तुकबन्‍दी बनाकर गानेवाले जोगीबाबा, लक्कड़ ध्वनि पर नृत्यकला बिखेरती नटिनिया, गिद्ध-प्रेमी पग्गल बाबा तथा सिंघा बजाता बंकिया डोम जैसे जिन्दा लोक पात्र हमेशा के लिए गायब होकर मुझे बड़ा दु:ख पहुँचाते हैं। —भूमिका से ‘murdahiya’ hamare ganv dharampur (azamgadh) ki bahuddeshiy karmasthli thi. Charvahi se lekar harvahi tak ke sare raste vahin se guzarte the. Itna hi nahin, skul ho ya dukan, bazar ho ya mandir, yahan tak ki mazduri ke liye kalkatta vali relgadi pakadna ho, to bhi murdahiya se hi guzarna padta tha. Hamare ganv ki ‘jio-paulitiks’ yani ‘bhu-rajniti’ mein daliton ke liye murdahiya ek samrik kendr jaisi thi. Jivan se lekar maran tak ki sari gatividhiyan murdahiya samet leti thi. Sabse rochak tathya ye hai ki murdahiya manav aur pashu mein koi farq nahin karti thi. Vah donon ki muktidata thi. Vishesh rup se mare hue pashuon ke manspind par jujhte saikdon giddhon ke saath kutte aur siyar murdahiya ko ek kala-sthli ke rup mein badal dete the. Raat ke samay inhin siyaron ki ‘huan-huan’ vali aavaz uski nirjanta ko bhang kar deti thi. Hamari dalit basti ke anaginat dalit hazaron du:kha-dard apne an‍dar liye murdahiya mein dafan ho ge the. Yadi unmen se kisi ki bhi aatmaktha likhi jati, uska shirshak ‘murdahiya’ hi hota. Murdahiya sahi maynon mein hamari dalit basti ki za‍in‍dagi thi.
Zamana chahe jo bhi ho, mere jaisa koi adna jab bhi paida hota hai, vah apne ird-gird ghumte lok-jivan ka hissa ban hi jata hai. Yahi karan tha ki lokjivan hamesha mera pichha karta raha. Parinamasvrup mere ghar se bhagne ke baad jab ‘murdahiya’ ka prtham khand samapt ho jata hai, to ganv ke har kisi ke mukh se nikle pahle shabd se tukban‍di banakar ganevale jogibaba, lakkad dhvani par nrityakla bikherti natiniya, giddh-premi paggal baba tatha singha bajata bankiya dom jaise jinda lok patr hamesha ke liye gayab hokar mujhe bada du:kha pahunchate hain. —bhumika se