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Koi Veerani Si Veerani Hai

Vijay Mohan Singh

Rs. 125 Rs. 111

यह ‘वीरानी’ किसकी है? दिल का, दिमाग़ और पूरे परिवेश का? ...उपन्यास लेकिन ‘वीरानी’ की तलाश नहीं है। तलाश है इस वीराने में अर्थ की। प्रतिभा और परिवेश सब बंजर हो रहे हैं। प्रतिभाएँ या तो कुंठित हो रही हैं या अपनी वहशत में क्रमिक हत्याओं तथा आत्महत्याओं की ओर... Read More

Description

यह ‘वीरानी’ किसकी है? दिल का, दिमाग़ और पूरे परिवेश का? ...उपन्यास लेकिन
‘वीरानी’ की तलाश नहीं है। तलाश है इस वीराने में अर्थ की। प्रतिभा और परिवेश सब बंजर हो रहे
हैं। प्रतिभाएँ या तो कुंठित हो रही हैं या अपनी वहशत में क्रमिक हत्याओं तथा आत्महत्याओं की
ओर अग्रसर। एक तीसरा रास्ता है : अपनी चतुर, कुटिल बुद्धि का लिप्सा में लिथड़ा भोगलिप्त
उपयोग। यह कथा इन तीनों पथों के पथिकों की एक स्थाली ‘पुलाक् न्याय’ की जानकारी देती है।
एक सामूहिक अक्षमता है जो हर कहीं जाकर अवरुद्ध हो जाती है : चाहे वह सफलता का रास्ता हो,
सुविधाओं के संसार का या सम्बन्ध, साहचर्य और प्रेम के निर्वाह का। ...आज का आदमी या तो
सिनिकल है या ऐसा समझदार जो हर शिकार के बाद एक ताज़ा मछली की तलाश में है लेकिन हर
मछली एक मरी हुई मछली है। ...यह एक संस्कृति की कहानी भी है जो कला और प्रचलन में फ़र्क़
करना भूल गई है। यह वीरानी उस विविधता की भी है क्योंकि जितनी विविधता होगी, उतनी ही
वीरानी बढ़ेगी। संकेतों, प्रतीकों तथा प्रयोजनार्थ निर्मित नाटकीय कथास्थितियों में मित कथन
को माध्यम बनाकर लिखा गया यह उपन्यास अपने व्यंजनार्थ में ही सब कुछ व्यक्त करने की चेष्टा
है।
सहज तथा सरल-सी प्रतीत होनेवाली इस कथा में एक काल है जो अपनी बंजरता में विस्तृत होता जा
रहा है : एक सामन्ती युग के अवशेष का अन्त तो दूसरी ओर तथाकथित आधुनिक का अनुभव,
अनुभूति का स्पर्शहीन अनवरत स्थानान्तरण : क़स्बा, नगर, महानगर तथा परदेश-गमन की
दिशाहीन यात्राओं की ओर! इन्हीं सबके इस सर्वव्यापी ‘आइसबर्ग’ के महज़ एक नाखून का रेखांकन
है यह। कम से कम दिखने और अधिक से अधिक दिखाने का प्रयास। इसीलिए इसमें सायास कुछ
नहीं है : जो है वह दृश्य में। व्याख्याओं, विश्लेषणों तथा स्थापनाओं के रूप में कुछ नहीं। एक
व्यक्तिगत, सामूहिक, सामाजिक अथवा सांकृतिक वीरानी अपने बयान में ही व्यक्त हो सकती
हैं—व्याख्या या बड़बोलेपन में नहीं। Ye ‘virani’ kiski hai? dil ka, dimag aur pure parivesh kaa?. . . Upanyas lekin‘virani’ ki talash nahin hai. Talash hai is virane mein arth ki. Pratibha aur parivesh sab banjar ho rahe
Hain. Pratibhayen ya to kunthit ho rahi hain ya apni vahshat mein krmik hatyaon tatha aatmhatyaon ki
Or agrsar. Ek tisra rasta hai : apni chatur, kutil buddhi ka lipsa mein lithda bhoglipt
Upyog. Ye katha in tinon pathon ke pathikon ki ek sthali ‘pulak nyay’ ki jankari deti hai.
Ek samuhik akshamta hai jo har kahin jakar avruddh ho jati hai : chahe vah saphalta ka rasta ho,
Suvidhaon ke sansar ka ya sambandh, sahcharya aur prem ke nirvah ka. . . . Aaj ka aadmi ya to
Sinikal hai ya aisa samajhdar jo har shikar ke baad ek taza machhli ki talash mein hai lekin har
Machhli ek mari hui machhli hai. . . . Ye ek sanskriti ki kahani bhi hai jo kala aur prachlan mein farq
Karna bhul gai hai. Ye virani us vividhta ki bhi hai kyonki jitni vividhta hogi, utni hi
Virani badhegi. Sanketon, prtikon tatha pryojnarth nirmit natkiy kathasthitiyon mein mit kathan
Ko madhyam banakar likha gaya ye upanyas apne vyanjnarth mein hi sab kuchh vyakt karne ki cheshta
Hai.
Sahaj tatha saral-si prtit honevali is katha mein ek kaal hai jo apni banjarta mein vistrit hota ja
Raha hai : ek samanti yug ke avshesh ka ant to dusri or tathakthit aadhunik ka anubhav,
Anubhuti ka sparshhin anavrat sthanantran : qasba, nagar, mahangar tatha pardesh-gaman ki
Dishahin yatraon ki or! inhin sabke is sarvavyapi ‘aisbarg’ ke mahaz ek nakhun ka rekhankan
Hai ye. Kam se kam dikhne aur adhik se adhik dikhane ka pryas. Isiliye ismen sayas kuchh
Nahin hai : jo hai vah drishya mein. Vyakhyaon, vishleshnon tatha sthapnaon ke rup mein kuchh nahin. Ek
Vyaktigat, samuhik, samajik athva sankritik virani apne bayan mein hi vyakt ho sakti
Hain—vyakhya ya badbolepan mein nahin.