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Samay Ka Sankshipt Itihas

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स्टीफेन हॉकिंग की यह पुस्तक विज्ञान-लेखन की दुनिया में अपनी लोकप्रियता के कारण अतिविशिष्ट स्थान रखती है। वर्ष 1988 में अपने प्रकाशन के मात्र दस वर्षों की अवधि में इस पुस्तक की 10 लाख से ज़्यादा प्रतियाँ बिकीं और आज भी जिज्ञासा की दुनिया में यह पुस्तक बदस्तूर अपनी जगह... Read More

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Description

स्टीफेन हॉकिंग की यह पुस्तक विज्ञान-लेखन की दुनिया में अपनी लोकप्रियता के कारण अतिविशिष्ट स्थान रखती है। वर्ष 1988 में अपने प्रकाशन के मात्र दस वर्षों की अवधि में इस पुस्तक की 10 लाख से ज़्यादा प्रतियाँ बिकीं और आज भी जिज्ञासा की दुनिया में यह पुस्तक बदस्तूर अपनी जगह बनाए हुए है।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह कहाँ से आया और क्या यह शाश्वत है या किसी ने बाक़ायदा इसकी रचना की है? बुद्धिचालित मनुष्य का उद्भव एक सांयोगिक घटना है या फिर मनुष्य के लिए ब्रह्मांड की रचना की गई, ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो सदा से हमें विचलित-उत्कंठित करते रहे हैं। यह पुस्तक इन सवालों का उत्तर देने का प्रयास करती है। इसमें आरम्भिक भू-केन्द्रिक ब्रह्मांडिकियों से लेकर बाद की सूर्य-केन्द्रिक ब्रह्मांडिकियों से होते हुए एक अनन्त ब्रह्मांड अथवा अनन्त रूप से विस्तृत अनेक ब्रह्मांडों तथा कृमि-छिद्रों की परिकल्पनाओं तक की हमारी विकास-यात्रा का संक्षिप्त और सरलतम वर्णन किया गया है।
इस संस्करण में पिछले दशक में ब्रह्मांडिकी के क्षेत्र में हासिल की गई नई सूचनाओं और नतीजों को भी सम्मिलित तो किया ही गया है; साथ ही, पुस्तक के प्रत्येक अध्याय को पूर्णतया परिवर्द्धित करते हुए प्राक्कथन के साथ-साथ वर्म होल और काल-यात्रा पर जो एक नितान्त नवीन अध्याय शामिल किया गया है, उसका महत्त्व सदैव बना रहेगा। Stiphen hauking ki ye pustak vigyan-lekhan ki duniya mein apni lokapriyta ke karan ativishisht sthan rakhti hai. Varsh 1988 mein apne prkashan ke matr das varshon ki avadhi mein is pustak ki 10 lakh se zyada pratiyan bikin aur aaj bhi jigyasa ki duniya mein ye pustak badastur apni jagah banaye hue hai. Brahmand ki utpatti kis prkar hui, ye kahan se aaya aur kya ye shashvat hai ya kisi ne baqayda iski rachna ki hai? buddhichalit manushya ka udbhav ek sanyogik ghatna hai ya phir manushya ke liye brahmand ki rachna ki gai, ye kuchh aise saval hain jo sada se hamein vichlit-utkanthit karte rahe hain. Ye pustak in savalon ka uttar dene ka pryas karti hai. Ismen aarambhik bhu-kendrik brahmandikiyon se lekar baad ki surya-kendrik brahmandikiyon se hote hue ek anant brahmand athva anant rup se vistrit anek brahmandon tatha krimi-chhidron ki parikalpnaon tak ki hamari vikas-yatra ka sankshipt aur saraltam varnan kiya gaya hai.
Is sanskran mein pichhle dashak mein brahmandiki ke kshetr mein hasil ki gai nai suchnaon aur natijon ko bhi sammilit to kiya hi gaya hai; saath hi, pustak ke pratyek adhyay ko purnatya parivarddhit karte hue prakkthan ke sath-sath varm hol aur kal-yatra par jo ek nitant navin adhyay shamil kiya gaya hai, uska mahattv sadaiv bana rahega.