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Saaye Mein Dhoop

Dushyant Kumar

Rs. 250 Rs. 223

जिंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है । उसमे फंसकर गेम-जाना और गेम-दौरां तक एक हो जाते हैं । ये गजलें दरअसल ऐसे ही एक दौर की देन हैं । यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि गजल मुझ पर नाजिल नहीं... Read More

Description

जिंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है । उसमे फंसकर गेम-जाना और गेम-दौरां तक एक हो जाते हैं । ये गजलें दरअसल ऐसे ही एक दौर की देन हैं । यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि गजल मुझ पर नाजिल नहीं हुई । मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैंने कभी चोरी-छिपे इसमें हाथ भी आजमाया है । लेकिन गजल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है और वह है कि भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्जा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए गजल का माध्यम ही क्यों चुना ? और अगर गजल के माध्यम से ग़ालिब अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजानिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ (जो व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती ? मुझे अपने बारे में कभी मुगालते नहीं रहे । मैं मानता हूँ, मैं ग़ालिब नहीं हूँ । उस प्रतिभा का शतांश भी शायद मुझमें नहीं है । लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरी तकलीफ ग़ालिब से कम हैं या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है । हो सकता है, अपनी-अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को यह वहम होता हो...लेकिन इतिहास मुझसे जुडी हुई मेरे समय की तकलीफ का गवाह खुद है । बस...अनुभूति की इसी जरा-सी पूँजी के सहारे मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर पड़ा । Jindgi mein kabhi-kabhi aisa daur aata hai jab takliph gunagunahat ke raste bahar aana chahti hai. Usme phanskar gem-jana aur gem-dauran tak ek ho jate hain. Ye gajlen darasal aise hi ek daur ki den hain. Yahan main saaf kar dun ki gajal mujh par najil nahin hui. Main pichhle pachchis varshon se ise sunta aur pasand karta aaya hun aur mainne kabhi chori-chhipe ismen hath bhi aajmaya hai. Lekin gajal likhne ya kahne ke pichhe ek jigyasa aksar mujhe tang karti rahi hai aur vah hai ki bhartiy kaviyon mein sabse prkhar anubhuti ke kavi mirja galib ne apni pida ki abhivyakti ke liye gajal ka madhyam hi kyon chuna ? aur agar gajal ke madhyam se galib apni niji takliph ko itna sarvjanik bana sakte hain to meri duhri takliph (jo vyaktigat bhi hai aur samajik bhi) is madhyam ke sahare ek apekshakrit vyapak pathak varg tak kyon nahin pahunch sakti ? mujhe apne bare mein kabhi mugalte nahin rahe. Main manta hun, main galib nahin hun. Us pratibha ka shatansh bhi shayad mujhmen nahin hai. Lekin main ye nahin manta ki meri takliph galib se kam hain ya mainne use kam shiddat se mahsus kiya hai. Ho sakta hai, apni-apni pida ko lekar har aadmi ko ye vaham hota ho. . . Lekin itihas mujhse judi hui mere samay ki takliph ka gavah khud hai. Bas. . . Anubhuti ki isi jara-si punji ke sahare main ustadon aur maharathiyon ke akhade mein utar pada.