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Ranu Aur Bhanu

Rs. 95

— रवीन्द्रनाथ को प्रतिदिन पूरे भारत से सैकड़ों चिट्ठियाँ मिलती थीं। वे यथासम्भव उनका जवाब भी देते थे। एक दिन एक पत्र पाकर कवि को बड़ा कौतुक महसूस हुआ। उस पत्र को वाराणसी से रानू नामक एक बालिका ने लिखा था। इसी उम्र में वह कवि का काफ़ी साहित्य पढ़... Read More

Description

— रवीन्द्रनाथ को प्रतिदिन पूरे भारत से सैकड़ों चिट्ठियाँ मिलती थीं। वे यथासम्भव उनका जवाब भी देते थे। एक दिन एक पत्र पाकर कवि को बड़ा कौतुक महसूस हुआ। उस पत्र को वाराणसी से रानू नामक एक बालिका ने लिखा था। इसी उम्र में वह कवि का काफ़ी साहित्य पढ़ चुकी थी। वे ही उसके सबसे क़रीबी व्यक्ति हो गए थे। उसकी शिकायत थी कि कवि इन दिनों इतनी कम कहानियाँ क्यों लिख रहे हैं। कवि ने उस बालिका के पत्र का जवाब दे दिया।
अपने गृहस्थ जीवन में रवीन्द्रनाथ को कभी मानसिक सुख-शान्ति नहीं मिली थी। अचानक एक दिन लम्बी बीमारी भोगने के बाद कवि की प्रिय बड़ी बेटी माधुरी लता का देहावसान हो गया। कवि टूट गए। उसी दिन अशान्त चित्त से एक भाड़े की गाड़ी लेकर वे भवानीपुर पहुँचे। नम्बर ढूँढ़कर एक घर के सामने रुककर उन्होंने पुकारा—रानू! रानू!
अपना नाम सुनते ही तेज़ी से एक बालिका नीचे उतर आई। कवि अपलक उसे देखते रह गए। यह वे किसे देख रहे थे? यह परी थी या स्वर्ग की कोई अप्सरा! उसी दिन अट्ठावन वर्षीय कवि से उस बालिका का एक विचित्र रिश्ता क़ायम हो गया। रानू कवि के खेल की संगिनी बन गई। नई रचनाओं की प्रेरणादात्री, उनकी खोई ‘बउठान’।
और रानू के लिए कवि हो गए उसके प्रिय भानु दादा।
कवि के चीन-भ्रमण के समय उनकी अनुपस्थिति में रानू की शादी तय हो गई। रानू अब सर राजेन मुखर्जी के पुत्र वीरेन की पत्नी बन गई। दो सन्तानों की माँ।
कवि अब वृद्ध थे। उन्हें जीवन के अन्तिम दिनों में रानू से क्या मिला? वह क्या सिर्फ़ ‘आँसुओं में दु:ख की शोभा’ बनी रह गई?
सुनील गंगोपाध्याय की क़लम से एक अभिनव और अतुलनीय उपन्यास। — ravindrnath ko pratidin pure bharat se saikdon chitthiyan milti thin. Ve yathasambhav unka javab bhi dete the. Ek din ek patr pakar kavi ko bada kautuk mahsus hua. Us patr ko varansi se ranu namak ek balika ne likha tha. Isi umr mein vah kavi ka kafi sahitya padh chuki thi. Ve hi uske sabse qaribi vyakti ho ge the. Uski shikayat thi ki kavi in dinon itni kam kahaniyan kyon likh rahe hain. Kavi ne us balika ke patr ka javab de diya. Apne grihasth jivan mein ravindrnath ko kabhi mansik sukh-shanti nahin mili thi. Achanak ek din lambi bimari bhogne ke baad kavi ki priy badi beti madhuri lata ka dehavsan ho gaya. Kavi tut ge. Usi din ashant chitt se ek bhade ki gadi lekar ve bhavanipur pahunche. Nambar dhundhakar ek ghar ke samne rukkar unhonne pukara—ranu! ranu!
Apna naam sunte hi tezi se ek balika niche utar aai. Kavi aplak use dekhte rah ge. Ye ve kise dekh rahe the? ye pari thi ya svarg ki koi apsra! usi din atthavan varshiy kavi se us balika ka ek vichitr rishta qayam ho gaya. Ranu kavi ke khel ki sangini ban gai. Nai rachnaon ki prernadatri, unki khoi ‘bauthan’.
Aur ranu ke liye kavi ho ge uske priy bhanu dada.
Kavi ke chin-bhrman ke samay unki anupasthiti mein ranu ki shadi tay ho gai. Ranu ab sar rajen mukharji ke putr viren ki patni ban gai. Do santanon ki man.
Kavi ab vriddh the. Unhen jivan ke antim dinon mein ranu se kya mila? vah kya sirf ‘ansuon mein du:kha ki shobha’ bani rah gai?
Sunil gangopadhyay ki qalam se ek abhinav aur atulniy upanyas.