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Pratinidhi Kavitayen : Trilochan

Rs. 75

त्रिलोचन का काव्य-व्यक्तित्व लगभग पचास वर्षों के लम्बे काल-विस्तार में फैला हुआ है। वे हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं—लगभग एक अद्वितीय कवि। वे एक विषम धरातल वाले कवि हैं। साथ ही उनके रचनात्मक व्यक्तित्व में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई पड़ता है। एक ओर यदि उनके यहाँ... Read More

Description

त्रिलोचन का काव्य-व्यक्तित्व लगभग पचास वर्षों के लम्बे काल-विस्तार में फैला हुआ है। वे हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं—लगभग एक अद्वितीय कवि। वे एक विषम धरातल वाले कवि हैं। साथ ही उनके रचनात्मक व्यक्तित्व में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई पड़ता है। एक ओर यदि उनके यहाँ गाँव की धरती का-सा ऊबड़-खाबड़पन दिखाई पड़ेगा तो दूसरी ओर कला की दृष्टि से एक अद्भुत क्लासिकी कसाव या अनुशासन भी।
त्रिलोचन की सहज-सरल-सी प्रतीत होनेवाली कविताओं को भी यदि ध्यान से देखा जाए तो उनकी तह में अनुभव की कई परतें खुलती दिखाई पड़ेंगी।
त्रिलोचन के यहाँ आत्मपरक कविताओं की संख्या बहुत अधिक है। अपने बारे में हिन्दी के शायद ही किसी कवि ने इतने रंगों में और इतनी कविताएँ लिखी हों। पर त्रिलोचन की आत्मपरक कविताएँ किसी भी स्तर पर आत्मग्रस्त कविताएँ नहीं हैं और यह उनकी गहरी यथार्थ-दृष्टि और कलात्मक क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
भाषा के प्रति त्रिलोचन एक बेहद सजग कवि हैं। त्रिलोचन की कविता में बोली के अपरिचित शब्द जितनी सहजता से आते हैं, कई बार संस्कृत के कठिन और लगभग प्रवाहच्युत शब्द भी उतनी ही सहजता से कविता में प्रवेश करते हैं और चुपचाप अपनी जगह बना लेते हैं। Trilochan ka kavya-vyaktitv lagbhag pachas varshon ke lambe kal-vistar mein phaila hua hai. Ve hamare samay ke ek atyant mahattvpurn kavi hain—lagbhag ek advitiy kavi. Ve ek visham dharatal vale kavi hain. Saath hi unke rachnatmak vyaktitv mein ek vichitr virodhabhas bhi dikhai padta hai. Ek or yadi unke yahan ganv ki dharti ka-sa uubad-khabadpan dikhai padega to dusri or kala ki drishti se ek adbhut klasiki kasav ya anushasan bhi. Trilochan ki sahaj-saral-si prtit honevali kavitaon ko bhi yadi dhyan se dekha jaye to unki tah mein anubhav ki kai parten khulti dikhai padengi.
Trilochan ke yahan aatmaprak kavitaon ki sankhya bahut adhik hai. Apne bare mein hindi ke shayad hi kisi kavi ne itne rangon mein aur itni kavitayen likhi hon. Par trilochan ki aatmaprak kavitayen kisi bhi star par aatmagrast kavitayen nahin hain aur ye unki gahri yatharth-drishti aur kalatmak kshamta ka sabse bada prman hai.
Bhasha ke prati trilochan ek behad sajag kavi hain. Trilochan ki kavita mein boli ke aparichit shabd jitni sahajta se aate hain, kai baar sanskrit ke kathin aur lagbhag prvahachyut shabd bhi utni hi sahajta se kavita mein prvesh karte hain aur chupchap apni jagah bana lete hain.