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Pratinidhi Kahaniyan : Kashinath Singh

Kashinath Singh

Rs. 99

साठोत्तरी पीढ़ी के जिन प्रगतिशील कथाकारों ने हिन्दी कहानी को नई ज़मीन सौंपने का काम किया, काशीनाथ सिंह का नाम उनमें विशेष महत्त्व रखता है। इस संग्रह में उनकी बहुचर्चित कहानियाँ शामिल की गई हैं। ध्वस्त होते पुराने समाज, व्यक्ति-मूल्यों तथा नई आकांक्षाओं के बीच जिस अर्थद्वन्द्व को जन-सामान्य झेल... Read More

Description

साठोत्तरी पीढ़ी के जिन प्रगतिशील कथाकारों ने हिन्दी कहानी को नई ज़मीन सौंपने का काम किया, काशीनाथ सिंह का नाम उनमें विशेष महत्त्व रखता है। इस संग्रह में उनकी बहुचर्चित कहानियाँ शामिल की गई हैं। ध्वस्त होते पुराने समाज, व्यक्ति-मूल्यों तथा नई आकांक्षाओं के बीच जिस अर्थद्वन्द्व को जन-सामान्य झेल रहा है, उसकी टकराहटों से उपजी, भयावह अन्तःसंघर्ष को रेखांकित करती हुई ये कहानियाँ पाठक को सहज ही अपनी-सी लगने लगती हैं। इनमें हम वर्तमान राजनीतिक ढाँचे के तहत पनप रही मूल्य-भ्रंशता को भी देखते हैं और जीवन-मूल्यों की पतनशील त्रासदी को भी महसूस करते हैं। समकालीन यथार्थ की गहरी पकड़, भाषा-शैली की सहजता और एक ख़ास क़िस्म का व्यंग्य इस सन्दर्भ में पाठक की भरपूर मदद करता है। वह एक प्रगतिशील मूल्य-दृष्टि को अपने भीतर खुलते हुए पाता है, क्योंकि काशीनाथ सिंह के कथा-चरित्र विभिन्न विरोधी जीवन-स्थितियों में पड़कर स्वयं अपना-अपना अन्तःसंघर्ष उजागर करते चलते हैं और इस प्रक्रिया में लेखकीय सोच की दिशा सहज ही पाठकीय सोच से एकमेक हो उठती है। Sathottri pidhi ke jin pragatishil kathakaron ne hindi kahani ko nai zamin saumpne ka kaam kiya, kashinath sinh ka naam unmen vishesh mahattv rakhta hai. Is sangrah mein unki bahucharchit kahaniyan shamil ki gai hain. Dhvast hote purane samaj, vyakti-mulyon tatha nai aakankshaon ke bich jis arthadvandv ko jan-samanya jhel raha hai, uski takrahton se upji, bhayavah antःsangharsh ko rekhankit karti hui ye kahaniyan pathak ko sahaj hi apni-si lagne lagti hain. Inmen hum vartman rajnitik dhanche ke tahat panap rahi mulya-bhranshta ko bhi dekhte hain aur jivan-mulyon ki patanshil trasdi ko bhi mahsus karte hain. Samkalin yatharth ki gahri pakad, bhasha-shaili ki sahajta aur ek khas qism ka vyangya is sandarbh mein pathak ki bharpur madad karta hai. Vah ek pragatishil mulya-drishti ko apne bhitar khulte hue pata hai, kyonki kashinath sinh ke katha-charitr vibhinn virodhi jivan-sthitiyon mein padkar svayan apna-apna antःsangharsh ujagar karte chalte hain aur is prakriya mein lekhkiy soch ki disha sahaj hi pathkiy soch se ekmek ho uthti hai.