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Poorva-Rang

Namvar Singh

Rs. 395 Rs. 352

“ऐसे युग में जहाँ मान्यताएँ विवादग्रस्त और अनिश्चित हों, ऐन्द्रिय विषय ही निश्चित हैं और उन्हीं का यथातथ्य चित्रण सम्भव भी है। यही वजह है कि आज के अधिकांश किशोर तथा किशोर-मति कवि प्राकृतिक चित्रों की खोज में विकल हैं। झंझटों से बाहर निकलने का यह आसान तरीक़ा है। समाज... Read More

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Description

“ऐसे युग में जहाँ मान्यताएँ विवादग्रस्त और अनिश्चित हों, ऐन्द्रिय विषय ही निश्चित हैं और उन्हीं का यथातथ्य चित्रण सम्भव भी है। यही वजह है कि आज के अधिकांश किशोर तथा किशोर-मति कवि प्राकृतिक चित्रों की खोज में विकल हैं। झंझटों से बाहर निकलने का यह आसान तरीक़ा है। समाज से कम झंझट प्रकृति में है और प्रकृति में भी इन्द्रियग्राह्य प्रभावों के चित्रण में सबसे कम झंझट है।” नामवर जी ने यह टिप्पणी 1957 में 'कवि' पत्रिका के 'विशिष्ट कवि' शीर्षक स्तम्भ में मुक्तिबोध से अन्य कवियों की तुलना करते हुए की थी। उल्लेखनीय है कि इस काल-खंड में उन्होंने श्री विष्णुचन्द्र शर्मा द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कवि' के लिए ‘कविमित्र' नाम से काफ़ी समय तक एक स्तम्भ लिखा था जिसमें वे समकालीन कविता और कवियों पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ करते थे। इस संकलन में उनमें से ज़्यादातर को ले लिया गया है।
पुस्तक में शामिल अन्य आलेख भी ज़्यादातर पाँचवें दशक में लिखे गए थे जिनमें से कुछ प्रकाशित हैं और कुछ अप्रकाशित। ऐसे अधूरे आलेख भी यहाँ जुटाए गए हैं जो किसी कारण से पूरे नहीं लिखे जा सके और जिन्हें काशीनाथ जी ने अपने पास सहेजकर रखा था। कहना न होगा कि इस पुस्तक में उस दौर के नामवर जी से हमारा परिचय होगा जब वे अपनी स्थापनाओं को आकार दे रहे थे और जिन्हें हमने बाद में आई उनकी पुस्तकों में देखा। “aise yug mein jahan manytayen vivadagrast aur anishchit hon, aindriy vishay hi nishchit hain aur unhin ka yathatathya chitran sambhav bhi hai. Yahi vajah hai ki aaj ke adhikansh kishor tatha kishor-mati kavi prakritik chitron ki khoj mein vikal hain. Jhanjhton se bahar nikalne ka ye aasan tariqa hai. Samaj se kam jhanjhat prkriti mein hai aur prkriti mein bhi indriyagrahya prbhavon ke chitran mein sabse kam jhanjhat hai. ” namvar ji ne ye tippni 1957 mein kavi patrika ke vishisht kavi shirshak stambh mein muktibodh se anya kaviyon ki tulna karte hue ki thi. Ullekhniy hai ki is kal-khand mein unhonne shri vishnuchandr sharma dvara sampadit patrika ‘kavi ke liye ‘kavimitr naam se kafi samay tak ek stambh likha tha jismen ve samkalin kavita aur kaviyon par sankshipt tippaniyan karte the. Is sanklan mein unmen se zyadatar ko le liya gaya hai. Pustak mein shamil anya aalekh bhi zyadatar panchaven dashak mein likhe ge the jinmen se kuchh prkashit hain aur kuchh aprkashit. Aise adhure aalekh bhi yahan jutaye ge hain jo kisi karan se pure nahin likhe ja sake aur jinhen kashinath ji ne apne paas sahejkar rakha tha. Kahna na hoga ki is pustak mein us daur ke namvar ji se hamara parichay hoga jab ve apni sthapnaon ko aakar de rahe the aur jinhen hamne baad mein aai unki pustkon mein dekha.