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Patta Patta Boota Boota

Kashinath Singh

Rs. 450 Rs. 401

काशीनाथ सिंह ने कई विधाओं में रचना की है। यह उनकी अभी तक असंकलित रचनाओं का संग्रह है जिसमें उनकी कुछ कहानियों के साथ कुछ अन्य गद्य रचनाओं को शामिल किया गया है। इनमें से कुछ कहानियों को काशीनाथ जी ने ख़ारिज के खाते में डाल रखा था। लेकिन किसी... Read More

Description

काशीनाथ सिंह ने कई विधाओं में रचना की है। यह उनकी अभी तक असंकलित रचनाओं का संग्रह है जिसमें उनकी कुछ कहानियों के साथ कुछ अन्य गद्य रचनाओं को शामिल किया गया है। इनमें से कुछ कहानियों को काशीनाथ जी ने ख़ारिज के खाते में डाल रखा था। लेकिन किसी भी रचनाकार की संरचना को पूरी तरह समझने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी उन रचनाओं को भी पढ़ा जाए, जिन्हें वह ख़ुद महत्त्वपूर्ण नहीं मानता। कई बार ऐसा भी होता है कि अपनी जिन चीज़ों को लेखक बहुत अहमियत नहीं देता, वे वास्तव में पाठकों के लिए बहुत महत्त्वर्ण साबित होती हैं। सम्भव है कि इनमें भी आपको कुछ ऐसी रचनाएँ दिख जाएँ।
काशीनाथ सिंह लोक-बोध से सम्पन्न रचनाकार रहे हैं। वे चीज़ों को वहाँ से देखने के हिमायती हैं जहाँ हम खड़े होते हैं, वहाँ से नहीं जहाँ से देखने का रिवाज चल निकलता है और हर कोई जिसे या तो फ़ैशन के चलते या पोलिटिकल करेक्टनेस के कारण अपनाने लगता है।
इस पुस्तक में शामिल रचनाओं में हमें उनकी अपनी दृष्टि से देखी हुई चीज़ें मिलती हैं जो हमें आगे अपनी दृष्टि विकसित करने, अपने पक्ष को परिभाषित करने का आधार देती हैं। इस पुस्तकीय प्रस्तुति का उद्देश्य काशीनाथ सिंह की पचास वर्षों के व्यापक कालखंड में बिखरे रचना-स्फुलिंगों को एकत्रित करना और उनके उस लेखक को समझना है जो इस बीच बना, साथ ही उसके बनने की प्रक्रिया को भी। Kashinath sinh ne kai vidhaon mein rachna ki hai. Ye unki abhi tak asanklit rachnaon ka sangrah hai jismen unki kuchh kahaniyon ke saath kuchh anya gadya rachnaon ko shamil kiya gaya hai. Inmen se kuchh kahaniyon ko kashinath ji ne kharij ke khate mein daal rakha tha. Lekin kisi bhi rachnakar ki sanrachna ko puri tarah samajhne ke liye ye aavashyak hai ki uski un rachnaon ko bhi padha jaye, jinhen vah khud mahattvpurn nahin manta. Kai baar aisa bhi hota hai ki apni jin chizon ko lekhak bahut ahamiyat nahin deta, ve vastav mein pathkon ke liye bahut mahattvarn sabit hoti hain. Sambhav hai ki inmen bhi aapko kuchh aisi rachnayen dikh jayen. Kashinath sinh lok-bodh se sampann rachnakar rahe hain. Ve chizon ko vahan se dekhne ke himayti hain jahan hum khade hote hain, vahan se nahin jahan se dekhne ka rivaj chal nikalta hai aur har koi jise ya to faishan ke chalte ya politikal karektnes ke karan apnane lagta hai.
Is pustak mein shamil rachnaon mein hamein unki apni drishti se dekhi hui chizen milti hain jo hamein aage apni drishti viksit karne, apne paksh ko paribhashit karne ka aadhar deti hain. Is pustkiy prastuti ka uddeshya kashinath sinh ki pachas varshon ke vyapak kalkhand mein bikhre rachna-sphulingon ko ekatrit karna aur unke us lekhak ko samajhna hai jo is bich bana, saath hi uske banne ki prakriya ko bhi.