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Nagarjun Rachanawali : Vols. 1-7

Nagarjun

Rs. 5,500 Rs. 4,895

उनके जीवन के लगभग अड़सठ वर्ष (1929–1997) रचनाकर्म को समर्पित। कविता, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्त, निबन्ध, बाल–साहित्य आदि सभी विधाओं में उन्होंने लिखा। हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में भी उन्होंने न सिर्फ़ मौलिक रचनाएँ कीं, इन भाषाओं से अनुवाद भी किए। कुछ पत्र–पत्रिकाओं में उन्होंने स्तम्भ-लेखन भी किया।... Read More

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Description

उनके जीवन के लगभग अड़सठ वर्ष (1929–1997) रचनाकर्म को समर्पित। कविता, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्त, निबन्ध, बाल–साहित्य आदि सभी विधाओं में उन्होंने लिखा। हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में भी उन्होंने न सिर्फ़ मौलिक रचनाएँ कीं, इन भाषाओं से अनुवाद भी किए। कुछ पत्र–पत्रिकाओं में उन्होंने स्तम्भ-लेखन भी किया।
रचनावली के प्रथम खंड में बाबा की उन सभी कविताओं को संकलित किया गया है, जिनका रचनाकाल 1967 ई. तक है। ‘युगधारा’, ‘सतरंगे पंखोंवाली’, ‘प्यासी पथराई आँखें’, ‘तुमने कहा था’, ‘हज़ार–हज़ार बाँहोंवाली’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’, ‘रत्नगर्भ’, ‘इस गुब्बारे की छाया में’ तथा ‘भूल जाओ पुराने सपने’—इन संग्रहों से 1967 तक की सभी कविताओं को कालक्रम से यहाँ ले लिया गया है।
इसके अलावा नागार्जुन के सर्वाधिक प्रिय कवि कालिदास की रचना ‘मेघदूत’ का उनके द्वारा मुक्तछन्द में किया गया अनुवाद भी इसमें संकलित है। यह अनुवाद 1953 में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के एक ही अंक में प्रकाशित हुआ। इसके बाद 1955 में पुस्तकाकार प्रकाशन के समय इसमें एक लम्बी भूमिका और कुछ पादटिप्पणियाँ भी जोड़ी गर्इं। रचनावली में वह इसी रूप में उपलब्ध है। Unke jivan ke lagbhag adsath varsh (1929–1997) rachnakarm ko samarpit. Kavita, upanyas, sansmran, yatravritt, nibandh, bal–sahitya aadi sabhi vidhaon mein unhonne likha. Hindi ke alava maithili, bangla aur sanskrit mein bhi unhonne na sirf maulik rachnayen kin, in bhashaon se anuvad bhi kiye. Kuchh patr–patrikaon mein unhonne stambh-lekhan bhi kiya. Rachnavli ke prtham khand mein baba ki un sabhi kavitaon ko sanklit kiya gaya hai, jinka rachnakal 1967 ii. Tak hai. ‘yugdhara’, ‘satrange pankhonvali’, ‘pyasi pathrai aankhen’, ‘tumne kaha tha’, ‘hazar–hazar banhonvali’, ‘purani jutiyon ka koras’, ‘ratngarbh’, ‘is gubbare ki chhaya men’ tatha ‘bhul jao purane sapne’—in sangrhon se 1967 tak ki sabhi kavitaon ko kalakram se yahan le liya gaya hai.
Iske alava nagarjun ke sarvadhik priy kavi kalidas ki rachna ‘meghdut’ ka unke dvara muktchhand mein kiya gaya anuvad bhi ismen sanklit hai. Ye anuvad 1953 mein ‘saptahik hindustan’ ke ek hi ank mein prkashit hua. Iske baad 1955 mein pustkakar prkashan ke samay ismen ek lambi bhumika aur kuchh padtippaniyan bhi jodi garin. Rachnavli mein vah isi rup mein uplabdh hai.