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Muktibodh : Ek Vyaktitwa Sahi Ki Talash Main

Krishna Sobti

Rs. 495 Rs. 441

हिन्दी कविता की शीर्षक लेखनी—मुक्तिबोध। आत्मसमीक्षा और जगत-विवेचन के निष्ठुर प्रस्तावक। उन्होंने एक दुर्गम पथ की ओर संकेत किया, जिससे होकर हमें अनुभव और अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता तक जाना था; क्या हम जा सके? हिन्दी की वरिष्ठतम उपस्थिति कृष्णा सोबती, जिनकी आँखों ने लगभग एक सदी का इतिहास साक्षात् देखा;... Read More

Description

हिन्दी कविता की शीर्षक लेखनी—मुक्तिबोध। आत्मसमीक्षा और जगत-विवेचन के निष्ठुर प्रस्तावक।
उन्होंने एक दुर्गम पथ की ओर संकेत किया, जिससे होकर हमें अनुभव और अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता तक जाना था; क्या हम जा सके?
हिन्दी की वरिष्ठतम उपस्थिति कृष्णा सोबती, जिनकी आँखों ने लगभग एक सदी का इतिहास साक्षात् देखा; और जो आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में आसपास फैले समय से उतनी ही व्यथित हैं, जितनी अपने समय और समाज में निपट अकेली, मुक्तिबोध की रूह रही होगी—मानवता विराट और सर्वसमावेशी उज्ज्वल स्वप्न के लगातार दूर होते जाने से कातर और क्रुद्ध।
यह मुक्तिबोध का एक अनौपचारिक पाठ है जिसे कृष्णा जी ने अपने गहरे संवेदित मन से किया है। भारतीय इतिहास के दो समय यहाँ रूबरू हैं। Hindi kavita ki shirshak lekhni—muktibodh. Aatmasmiksha aur jagat-vivechan ke nishthur prastavak. Unhonne ek durgam path ki or sanket kiya, jisse hokar hamein anubhav aur abhivyakti ki sampurnta tak jana tha; kya hum ja sake?
Hindi ki varishthtam upasthiti krishna sobti, jinki aankhon ne lagbhag ek sadi ka itihas sakshat dekha; aur jo aaj ikkisvin sadi ke dusre dashak mein aaspas phaile samay se utni hi vythit hain, jitni apne samay aur samaj mein nipat akeli, muktibodh ki ruh rahi hogi—manavta virat aur sarvasmaveshi ujjval svapn ke lagatar dur hote jane se katar aur kruddh.
Ye muktibodh ka ek anaupcharik path hai jise krishna ji ne apne gahre sanvedit man se kiya hai. Bhartiy itihas ke do samay yahan rubru hain.