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Mitro Marjani

Rs. 150

रघुवीर सहाय की पंक्ति है—जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है। चरित्र की दृष्टि से मित्रो हिन्दी... Read More

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Description

रघुवीर सहाय की पंक्ति है—जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है।
चरित्र की दृष्टि से मित्रो हिन्दी कहानी की अभूतपूर्व पात्र है। इस गृहस्थी में पता नहीं कहाँ से टपक पड़ी है, उसने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। ऐसा सजीव, सदेह पात्र किसी परिवार को तोड़ देता, पति को पागल कर देता, हत्या हो जाती। लेकिन मित्रो को ऐसे धर्मभीरु, मध्यवर्गीय, परिवार में डालकर कृष्णा सोबती ने बेलौस टक्कर की योजना की है। यह टक्कर बहुत तेज़ है लेकिन ख़तम नहीं होती। विरोधी स्थितियाँ पूरी कथा-अवधि में सक्रिय रहती हैं अनेक दाँव-पेंच करती हुई। पूरी कहानी इस टक्कर से स्पन्दित है।
मित्रो इसलिए भी अभूतपूर्व है कि बहुत सहज है। यह अभूतपूर्वता असामान्यता नहीं, वास्तविकता से उपजी है। मित्रो जैसे व्यक्ति समाज में थे, उन्हें साहित्य में नहीं लाया गया था—हिन्दी कहानी में नहीं लाया गया था। मित्रो कोई मनोविश्लेषणात्मक या असामान्य पात्र नहीं।
हिन्दी में उस जैसी स्त्री का प्रवेश पहली बार हुआ। कृष्णा सोबती ने ऐसे भरपूर पात्र को केन्द्र में रखकर यह कहानी लिखी, यह नई बात है। इसके लिए बहुत साहस, निर्ममता और ममता की ज़रूरत पड़ी होगी। यह सब बहुत-बहुत आत्मीय परिचय, पात्र से तादात्म्य के बिना सम्भव नहीं था।
—विश्वनाथ त्रिपाठी
कुछ कहानियाँ : कुछ विचार पुस्तक से Raghuvir sahay ki pankti hai—jiska bhav hai ki is duniya ke sir par andhere mein agar main ek danda marun to ye kis bhasha mein chikhegi? mitro is kahani mein sanyukt parivar ki bhiru aatmtusht duniya ke sir par padnevale dande ki chot hai. Charitr ki drishti se mitro hindi kahani ki abhutpurv patr hai. Is grihasthi mein pata nahin kahan se tapak padi hai, usne sab kuchh ast-vyast kar diya hai. Aisa sajiv, sadeh patr kisi parivar ko tod deta, pati ko pagal kar deta, hatya ho jati. Lekin mitro ko aise dharmbhiru, madhyvargiy, parivar mein dalkar krishna sobti ne belaus takkar ki yojna ki hai. Ye takkar bahut tez hai lekin khatam nahin hoti. Virodhi sthitiyan puri katha-avadhi mein sakriy rahti hain anek danv-pench karti hui. Puri kahani is takkar se spandit hai.
Mitro isaliye bhi abhutpurv hai ki bahut sahaj hai. Ye abhutpurvta asamanyta nahin, vastavikta se upji hai. Mitro jaise vyakti samaj mein the, unhen sahitya mein nahin laya gaya tha—hindi kahani mein nahin laya gaya tha. Mitro koi manovishleshnatmak ya asamanya patr nahin.
Hindi mein us jaisi stri ka prvesh pahli baar hua. Krishna sobti ne aise bharpur patr ko kendr mein rakhkar ye kahani likhi, ye nai baat hai. Iske liye bahut sahas, nirmamta aur mamta ki zarurat padi hogi. Ye sab bahut-bahut aatmiy parichay, patr se tadatmya ke bina sambhav nahin tha.
—vishvnath tripathi
Kuchh kahaniyan : kuchh vichar pustak se