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Meri Zameen Mera Aasman
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वर्षों पुरानी बात है, ऑल इंडिया रेडियो के परिसर में, वहाँ के मटमैले वातावरण में एक नवयुवती, कसी हुई जींस और लम्बे बूट पहने खट-खट करती गहरे आत्मविश्वास का दुशाला ओढ़े आती-जाती दिखाई पड़ती थी। पता चला, वह रूसी भाषा, तोल्स्तोय-दोस्तोयेवस्की जैसे महान लेखकों की भाषा जानती है और रेडियो में रूसी भाषा की विभागाध्यक्षा थी। यही नहीं, वह बड़े-बड़े समारोहों और विचार-गोष्ठियों में रूसी अतिथियों और भारत के मंत्रिगण, जैसे कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी, श्री नरसिंह राव, श्री इन्द्र कुमार गुजराल, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, के मध्य दुभाषिए के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। वहीं पता चला, उसका नाम लवलीन है और वह रेडियो ही नहीं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी रूसी भाषा पढ़ाती है। उसे निकट से देखा—सुन्दर मुखाकृति, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें मुझे ढेर सारे सपने झिलमिलाते नज़र आए थे। उसके बेपरवाह घुँघराले बाल और कर्मठ कसावट वाला व्यक्तित्व मुझे बड़ा प्रभावशाली लगा था। तब परिचय हो नहीं पाया और बीच से बहुत से वर्ष फिसल गए। परन्तु उसके चेहरे का, व्यक्तित्व का प्रभाव मेरी ‘इमोशनल मेमोरी’ में सदा बना रहा। जब मिली तो वह लवलीन, लवलीन थदानी बन चुकी थी, वेदान्त और कर्मण्य की माँ भी, परन्तु आश्चर्य हुआ मुझे, उम्र के परिवर्तन ने उसके शरीर को अनछुआ छोड़ दिया था, वह पहले जैसी ही थी—सौम्य और मधुर। इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर के किसी कार्यक्रम में उसकी अंग्रेज़ी की कविताएँ सुनीं, उसकी कविताएँ मेरे मन के भीतर उतर गईं, जाने-अनजाने भावनाओं के गर्भगृह में हमारा एक जुड़ाव पनप गया। तब से हम जितना बन पड़ा, मिलते रहे। मेरी फ़िल्म ‘पंचवटी’ पर एक कार्यक्रम का संचालन लवलीन को करना था तो एक पूरा दिन हम एक सूने कमरे में साथ-साथ बैठे रहे एक-दूसरे को जानने के तहत...मैं उसकी दीदी हो गई। कुछ भावनाओं की केमिस्ट्री पता नहीं कैसे एक दूसरे जैसी हो जाती है। मुड़कर देखती हूँ तो याद पड़ता है, मैंने लवलीन का कोई भी कार्यक्रम, कविताएँ हों या उसकी बनाई फ़िल्में, कुछ नहीं छोड़ा...तो, उसका व्यक्तित्व हर प्रस्तुति में, जैसा वह कहती है, ‘थकती नहीं मैं जीने से’ बड़ा सार्थक लगा था, उसका अन्दाज़-ए-बयाँ उसका अपना था। अपनी कविताओं के सभी रूपों में वह स्वयं सम्मोहित थी और अब भी है, आकारों में, धरती के उन कणों में जहाँ वह गुलाब भी रखती है और चिराग़ भी जलाती है। ज़मीं से आसमाँ तक वह ख़ुद को तलाशती नज़र आती है। वह मानती भी है ֹ‘हमें ख़ुद ही देना होगा अपना साथ।’ अपनी लेखन यात्रा में उसने कोई तंत्र-मंत्र नहीं जपा, बिना किसी औपचारिकता में उलझे, वह चलती चली गई—सांसारिक होकर भी तपस्विनी। जब भी मैं उसे देखती, मुझे लगता, कृष्ण भक्त मीरा की तरह लवलीन सन्त-महात्माओं के बताए निर्गुण शब्द से अलग, सगुण प्रेम में लीन है। यह भी सच था कि अपनी दीवानगी की रहगुज़र बनीं वे पगडंडियाँ, जो उसे उन पुराने अन्धविश्वास को जीनेवाले, गली-कूचों और गाँव में ले गईं, जहाँ गुमराह करनेवाला अँधेरा पसरा हुआ था। लवलीन ने अपनी नाजुक उँगलियों से कुरेद-कुरेदकर उन सभी कुरीतियों की दास्तानें जमा कीं जो मनुष्यत्व के नाम पर एक-एक कालिख जैसी थीं। उसकी फ़िल्में मैंने देखी हैं...वह फ़ॉर्मूलाबद्ध फ़िल्में नहीं थीं, उनमें सामाजिक कुरीतियों (विशेष रूप से स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण, विसंगतियाँ) के प्रति गहरा आक्रोश है, एक विषाद और हताशा जिसकी चोट से विकृत रूप को बड़ी नाटकीयता से सबके सामने रखती है और साथ ही दर्शक को एक तर्कयुक्त निर्णय तक पहुँचाती है। उसकी फ़िल्में आत्मा को झकझोरतीं...भीतरी मानसिकता को भी, जहाँ क़ानून, पुलिस या अदालत नहीं होते, होता है एक आत्मिक दंड। वह कोई दावा नहीं करती, केवल समाज को उसका असली चेहरा दिखाती है। वह घुल जाती है अपने कथानक में, घुमड़ते दु:ख में...कष्ट में, पाप में—तब न पाप बचता है, न सारे के सारे द्वैत भाव जो मिट जाते हैं—वह अकेले बचती है, पार उतर जाती है और आनन्‍द ही तो होता है, सुख-दु:ख दोनों के पार। लवलीन के भावचित्र कविता हो या फ़िल्म, अपनी तरह से पुराने विश्वासों, संकल्पों, भावनाओं को नए-नए शब्द देते हैं। सत्य को वह भिन्न-भिन्न रूप से परिभाषित करती है...नहीं तो उसका अपनापन, सनातन सत्य, पुराने ढाँचों में आबद्ध दम तोड़ देता। उसे लगता है, सत्य को नई उद्‌भावना चाहिए, नई तरंग—“इनसानियत को मुस्कुराहट के तोहफ़ों से सजाएँगे अपने बुज़ुर्गों की ग़लतियों को, हरगिज़ नहीं दोहराएँगे?” अद्‌भुत है लवलीन की आत्मिक ऊर्जा, उसका व्यापक चैतन्य, जब वह अमृता प्रीतम के जीवन पर आधारित नाटक में अमृता प्रीतम की भूमिका निभा रही थी। पूरी की पूरी मानसिकता में अमृता प्रीतम को वह हर पल जी रही थी—मंच पर और मंच के बाद भी। नाटक में, उर्दू के प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी की मृत्यु पर फूट-फूटकर रोती लवलीन, लवलीन नहीं बची थी, पूरी अमृता हो गई थी। मैं हैरानी से सोचती कहाँ से ले आती है वह इतनी ऊर्जा? इतने सारे काम एक साथ कर डालती है बिना थके, बिना हार माने। कितना जोखिम-भरा रहा होगा उसके लिए कारागार में जाकर अपनी फ़िल्म 'बलात्कार' या 'रेप' की शूटिंग करना—औरत पर हुए ज़ुल्मों को बयान करना। परन्तु वह मगन है अपनी तपश्चर्या में, दीवानगी में, फक्कड़पन में, बिना मेहनत-मशक्कत किए जी नहीं पाती...अपना बहुमूल्य ज्ञान बाँटने में जुटी है। और उसके लिए वह जाने कहाँ-कहाँ से जाती है, बेझिझक यह कविता संग्रह ‘मेरी ज़मीन मेरा आसमान’ ही आख़िरी मंज़िल नहीं है उसकी, लवलीन के पास अभी भी ढेर सारे अनगाए गीत हैं…नज्‍़में हैं। प्रेम में पागल होकर पद्य गाए जाते हैं और दीवानगी में जिया जाता है—उसकी बेचैन रूह उसे जीने कहाँ देती है! चाहे वह जितना कहे—“मैं पौधे को पानी देती गई और प्यास मेरी बुझती गई।” वैसा होता कहाँ है! अभी यहाँ है, कल उसकी प्यासी आत्मा किसी पहाड़ की अँधेरी गुफ़ा में कुछ नया तलाशती मिल जाएगी आपको। परन्तु एक उसी क्षण उसका चेहरा आत्मसन्तुष्टि से भरा चमचमाता है, जब वह अपने बच्चों का नाम लेती है—वेदान्त और कर्मण्ये, जैसे नाम नहीं ले रही, मंत्रोच्चारण कर रही है। ज़िन्दगी के हर पहलू को लवलीन भरपूर जीती है—पूरी सच्चाई और शिद्‌दत के साथ। –डॉ. कुसुम अंसल Varshon purani baat hai, aul indiya rediyo ke parisar mein, vahan ke matamaile vatavran mein ek navayuvti, kasi hui jins aur lambe but pahne khat-khat karti gahre aatmvishvas ka dushala odhe aati-jati dikhai padti thi. Pata chala, vah rusi bhasha, tolstoy-dostoyevaski jaise mahan lekhkon ki bhasha janti hai aur rediyo mein rusi bhasha ki vibhagadhyaksha thi. Yahi nahin, vah bade-bade samarohon aur vichar-goshthiyon mein rusi atithiyon aur bharat ke mantrigan, jaise ki bhutpurv prdhanmantri shri rajiv gandhi, shri narsinh raav, shri indr kumar gujral, shri atal bihari vajpeyi, ke madhya dubhashiye ke rup mein ek mahattvpurn bhumika nibhati thi. Vahin pata chala, uska naam lavlin hai aur vah rediyo hi nahin, javaharlal nehru vishvvidyalay mein bhi rusi bhasha padhati hai. Use nikat se dekha—sundar mukhakriti, badi-badi aankhen jinmen mujhe dher sare sapne jhilamilate nazar aae the. Uske beparvah ghunghrale baal aur karmath kasavat vala vyaktitv mujhe bada prbhavshali laga tha. Tab parichay ho nahin paya aur bich se bahut se varsh phisal ge. Parantu uske chehre ka, vyaktitv ka prbhav meri ‘imoshnal memori’ mein sada bana raha. Jab mili to vah lavlin, lavlin thadani ban chuki thi, vedant aur karmanya ki man bhi, parantu aashcharya hua mujhe, umr ke parivartan ne uske sharir ko anachhua chhod diya tha, vah pahle jaisi hi thi—saumya aur madhur. Indiya intarneshnal sentar ke kisi karyakram mein uski angrezi ki kavitayen sunin, uski kavitayen mere man ke bhitar utar gain, jane-anjane bhavnaon ke garbhgrih mein hamara ek judav panap gaya. Tab se hum jitna ban pada, milte rahe. Meri film ‘panchavti’ par ek karyakram ka sanchalan lavlin ko karna tha to ek pura din hum ek sune kamre mein sath-sath baithe rahe ek-dusre ko janne ke tahat. . . Main uski didi ho gai. Kuchh bhavnaon ki kemistri pata nahin kaise ek dusre jaisi ho jati hai. Mudkar dekhti hun to yaad padta hai, mainne lavlin ka koi bhi karyakram, kavitayen hon ya uski banai filmen, kuchh nahin chhoda. . . To, uska vyaktitv har prastuti mein, jaisa vah kahti hai, ‘thakti nahin main jine se’ bada sarthak laga tha, uska andaz-e-bayan uska apna tha. Apni kavitaon ke sabhi rupon mein vah svayan sammohit thi aur ab bhi hai, aakaron mein, dharti ke un kanon mein jahan vah gulab bhi rakhti hai aur chirag bhi jalati hai. Zamin se aasman tak vah khud ko talashti nazar aati hai. Vah manti bhi hai ֹ‘hamen khud hi dena hoga apna saath. ’ apni lekhan yatra mein usne koi tantr-mantr nahin japa, bina kisi aupcharikta mein uljhe, vah chalti chali gai—sansarik hokar bhi tapasvini. Jab bhi main use dekhti, mujhe lagta, krishn bhakt mira ki tarah lavlin sant-mahatmaon ke bataye nirgun shabd se alag, sagun prem mein lin hai. Ye bhi sach tha ki apni divangi ki rahaguzar banin ve pagdandiyan, jo use un purane andhvishvas ko jinevale, gali-kuchon aur ganv mein le gain, jahan gumrah karnevala andhera pasra hua tha. Lavlin ne apni najuk ungliyon se kured-kuredkar un sabhi kuritiyon ki dastanen jama kin jo manushyatv ke naam par ek-ek kalikh jaisi thin. Uski filmen mainne dekhi hain. . . Vah faurmulabaddh filmen nahin thin, unmen samajik kuritiyon (vishesh rup se stri ke prati samaj ka drishtikon, visangatiyan) ke prati gahra aakrosh hai, ek vishad aur hatasha jiski chot se vikrit rup ko badi natkiyta se sabke samne rakhti hai aur saath hi darshak ko ek tarkyukt nirnay tak pahunchati hai. Uski filmen aatma ko jhakjhortin. . . Bhitri manasikta ko bhi, jahan qanun, pulis ya adalat nahin hote, hota hai ek aatmik dand. Vah koi dava nahin karti, keval samaj ko uska asli chehra dikhati hai. Vah ghul jati hai apne kathanak mein, ghumadte du:kha mein. . . Kasht mein, paap men—tab na paap bachta hai, na sare ke sare dvait bhav jo mit jate hain—vah akele bachti hai, paar utar jati hai aur aanan‍da hi to hota hai, sukh-du:kha donon ke paar. Lavlin ke bhavchitr kavita ho ya film, apni tarah se purane vishvason, sankalpon, bhavnaon ko ne-ne shabd dete hain. Satya ko vah bhinn-bhinn rup se paribhashit karti hai. . . Nahin to uska apnapan, sanatan satya, purane dhanchon mein aabaddh dam tod deta. Use lagta hai, satya ko nai ud‌bhavna chahiye, nai tarang—“insaniyat ko muskurahat ke tohfon se sajayenge apne buzurgon ki galatiyon ko, hargiz nahin dohrayenge?” ad‌bhut hai lavlin ki aatmik uurja, uska vyapak chaitanya, jab vah amrita pritam ke jivan par aadharit natak mein amrita pritam ki bhumika nibha rahi thi. Puri ki puri manasikta mein amrita pritam ko vah har pal ji rahi thi—manch par aur manch ke baad bhi. Natak mein, urdu ke prsiddh shayar sahir ludhiyanvi ki mrityu par phut-phutkar roti lavlin, lavlin nahin bachi thi, puri amrita ho gai thi. Main hairani se sochti kahan se le aati hai vah itni uurja? itne sare kaam ek saath kar dalti hai bina thake, bina haar mane. Kitna jokhim-bhara raha hoga uske liye karagar mein jakar apni film balatkar ya rep ki shuting karna—aurat par hue zulmon ko bayan karna. Parantu vah magan hai apni tapashcharya mein, divangi mein, phakkadpan mein, bina mehnat-mashakkat kiye ji nahin pati. . . Apna bahumulya gyan bantane mein juti hai. Aur uske liye vah jane kahan-kahan se jati hai, bejhijhak ye kavita sangrah ‘meri zamin mera aasman’ hi aakhiri manzil nahin hai uski, lavlin ke paas abhi bhi dher sare angaye git hain…naj‍men hain. Prem mein pagal hokar padya gaye jate hain aur divangi mein jiya jata hai—uski bechain ruh use jine kahan deti hai! chahe vah jitna kahe—“main paudhe ko pani deti gai aur pyas meri bujhti gai. ” vaisa hota kahan hai! abhi yahan hai, kal uski pyasi aatma kisi pahad ki andheri gufa mein kuchh naya talashti mil jayegi aapko. Parantu ek usi kshan uska chehra aatmsantushti se bhara chamachmata hai, jab vah apne bachchon ka naam leti hai—vedant aur karmanye, jaise naam nahin le rahi, mantrochcharan kar rahi hai. Zindagi ke har pahlu ko lavlin bharpur jiti hai—puri sachchai aur shid‌dat ke saath. –dau. Kusum ansal

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