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Mere Sandhi-Patra

Suryabala

Rs. 150 Rs. 134

हिन्दी साहित्य में जिस रचना पीढ़ी को साठोत्तरी पीढ़ी कहा जाता है, सूर्यबाला उसकी प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी लेखकीय पहचान के केन्द्र में उनका पहला उपन्यास ‘मेरे संधि-पत्र’ है। उपन्यास का प्रकाशन सत्तर के दशक के मध्य में प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ में हुआ था। उपन्यास की कथा के केन्द्र में... Read More

Description

हिन्दी साहित्य में जिस रचना पीढ़ी को साठोत्तरी पीढ़ी कहा जाता है, सूर्यबाला उसकी प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी लेखकीय पहचान के केन्द्र में उनका पहला उपन्यास ‘मेरे संधि-पत्र’ है। उपन्यास का प्रकाशन सत्तर के दशक के मध्य में प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ में हुआ था। उपन्यास की कथा के केन्द्र में ‘शिवा’ नामक स्त्री का किरदार है जो अपने समय की नारी का प्रतिनिधित्व करती है और नारी-जीवन को लेकर उठनेवाले सतत सवालों की चुनौती को स्वीकार करती है। वह मध्यवर्गीय शिक्षित स्त्री है और उपन्यास में उसके कई रूप दिखाई देते हैं। वह आत्मविश्वास से भरपूर है, स्वाभिमानी है। अपनी पहचान को लेकर सजग है लेकिन विद्रोह नहीं करती है, न ही अपने आपको परिस्थितियों का दास बन जाने देती है; बल्कि अपने विवेक से ऐसे निर्णय लेती है जो उसके, परिवार और समाज के हित में हों। यही उसके संधि-पत्र हैं।
‘मेरे संधि-पत्र’ के केन्द्र में मध्यवर्गीय स्त्री के मन के द्वन्द्व हैं, निर्णय-अनिर्णय की स्थितियाँ हैं, इसमें स्त्री का शोषण नहीं है, बल्कि उसको बेपनाह प्यार करनेवाला पति है और उसके सौतेले बच्चे। समाज, परिवार, मान-मर्यादा को लेकर उपन्यास में जो सवाल उठाए गए हैं, वे आज भी स्त्री-विमर्श के लिए गौण मुद्दे नहीं हैं। उपन्यास में यह बात तो है कि स्त्री ऐसे पुरुष के सामने ही समर्पण कर पाती जो बौद्धिक रूप से उससे श्रेष्ठ हो, लेकिन उपन्यास की नायिका अन्त में सामाजिकता का वरण करती है। मुखर स्त्री-विमर्श के दौर में मितकथन वाला यह उपन्यास अपने प्रश्नों के कारण समकालीन लगने लगता है। Hindi sahitya mein jis rachna pidhi ko sathottri pidhi kaha jata hai, surybala uski prmukh hastakshar hain. Unki lekhkiy pahchan ke kendr mein unka pahla upanyas ‘mere sandhi-patr’ hai. Upanyas ka prkashan sattar ke dashak ke madhya mein prsiddh saptahik ‘dharmyug’ mein hua tha. Upanyas ki katha ke kendr mein ‘shiva’ namak stri ka kirdar hai jo apne samay ki nari ka pratinidhitv karti hai aur nari-jivan ko lekar uthnevale satat savalon ki chunauti ko svikar karti hai. Vah madhyvargiy shikshit stri hai aur upanyas mein uske kai rup dikhai dete hain. Vah aatmvishvas se bharpur hai, svabhimani hai. Apni pahchan ko lekar sajag hai lekin vidroh nahin karti hai, na hi apne aapko paristhitiyon ka daas ban jane deti hai; balki apne vivek se aise nirnay leti hai jo uske, parivar aur samaj ke hit mein hon. Yahi uske sandhi-patr hain. ‘mere sandhi-patr’ ke kendr mein madhyvargiy stri ke man ke dvandv hain, nirnay-anirnay ki sthitiyan hain, ismen stri ka shoshan nahin hai, balki usko bepnah pyar karnevala pati hai aur uske sautele bachche. Samaj, parivar, man-maryada ko lekar upanyas mein jo saval uthaye ge hain, ve aaj bhi stri-vimarsh ke liye gaun mudde nahin hain. Upanyas mein ye baat to hai ki stri aise purush ke samne hi samarpan kar pati jo bauddhik rup se usse shreshth ho, lekin upanyas ki nayika ant mein samajikta ka varan karti hai. Mukhar stri-vimarsh ke daur mein mitakthan vala ye upanyas apne prashnon ke karan samkalin lagne lagta hai.