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Megh Jaisa Manushya

Shankha Ghosh, Tr. Prayag Shukla

Rs. 250 Rs. 238

शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों... Read More

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शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है।
उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है!
उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा। Shankh ghosh ki kavita ka svar sandr hai, usmen gahri karuna hai. Aur uski shabd sampda hamein drishyon/paristhitiyon ki ek badi renj ke bich khada kar deti hai—jahan se dainandin jivan ko samajhne-bujhne ke saath, hum srishti aur prkriti ke bahutere marmon ko bhi chihnit kar pate hain. Vah sanketon mein bhi bahut kuchh kahti hai. Bimb to vah kai tarah ke rachti hi hai. Aur upmaon ka jahan-jahan pryog hai, ve anuthi hi hain. Unki kavitaon mein arth-gambhirya hai aur is gambhirya ke srot vinod aur prkhar uktiyon mein bhi chhipe hain. Gahan-gambhir chintan mein to hain hi. Vah un kaviyon mein se hain jinki kavita apni ek vishisht pahchan mano aarambh se aankati aai hai, par apne vishisht svar ki raksha karte hue, vah apne ko har charan mein kuchh ‘naya’ bhi karti aai hai, jismen samajik-sanskritik aur rajnitik paristhitiyon ke ‘gudharth’ bhi padhe ja sakte hain. Usmen ek zabardast naitik aur manviy aagrah hai. Vah manushya-prkriti ke anivarya sambandh ki pakshdhar hai. Uski paryavarniy chintayen bhi hain, aur vah manviy sambandhon mein ek nikhar, parishkar ke saath, unmen ek barabri ki aakankshi hai. Unki kavita mein jal-janit bimb bar-bar lautte hain. Jal-dhara, aur jalashay—sirf pokhar-tal tak simit nahin hain, unmen jal ke aashay nihit hain, aur jal ki nirmalta, man ki nirmalta ka paryay ban jati hai. Usmen pashu-pakshiyon ki, vibhinn grah-nakshatron ki upasthiti hai, aur varsha ke prsang se to vah varsha-saundarya se aaplavit bhi hai. Unki kavita ki jaden bangbhumi mein, uski bhasha aur sanskriti mein bahut gahri hain, par uski ‘sthanikta’ hardam sarvdeshiy ya sarvajnin hone ki kshamta rakhti hai!
Usmen aadhunikta/samkalinta ki svikriti hai to ek saghan vidambna-bodh bhi hai. Kul milakar usmen khasa vaividhya hai—anubhav kshetron ka, aatmik prtitiyon ka, rachna-vidhiyon ka bhi. Yahi karan hai ki use padhte hue hardam ek tazgi ka, kuchh naya pane ka anubhav hota hai. Ye sanklan unki kavita ke vibhinn charnon ki bangi prastut karne ka ek upakram hai. Sahaj hi hamein ye vishvas hai ki hindi-jagat mein iska bharpur svagat hoga.

Description

शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है।
उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है!
उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा। Shankh ghosh ki kavita ka svar sandr hai, usmen gahri karuna hai. Aur uski shabd sampda hamein drishyon/paristhitiyon ki ek badi renj ke bich khada kar deti hai—jahan se dainandin jivan ko samajhne-bujhne ke saath, hum srishti aur prkriti ke bahutere marmon ko bhi chihnit kar pate hain. Vah sanketon mein bhi bahut kuchh kahti hai. Bimb to vah kai tarah ke rachti hi hai. Aur upmaon ka jahan-jahan pryog hai, ve anuthi hi hain. Unki kavitaon mein arth-gambhirya hai aur is gambhirya ke srot vinod aur prkhar uktiyon mein bhi chhipe hain. Gahan-gambhir chintan mein to hain hi. Vah un kaviyon mein se hain jinki kavita apni ek vishisht pahchan mano aarambh se aankati aai hai, par apne vishisht svar ki raksha karte hue, vah apne ko har charan mein kuchh ‘naya’ bhi karti aai hai, jismen samajik-sanskritik aur rajnitik paristhitiyon ke ‘gudharth’ bhi padhe ja sakte hain. Usmen ek zabardast naitik aur manviy aagrah hai. Vah manushya-prkriti ke anivarya sambandh ki pakshdhar hai. Uski paryavarniy chintayen bhi hain, aur vah manviy sambandhon mein ek nikhar, parishkar ke saath, unmen ek barabri ki aakankshi hai. Unki kavita mein jal-janit bimb bar-bar lautte hain. Jal-dhara, aur jalashay—sirf pokhar-tal tak simit nahin hain, unmen jal ke aashay nihit hain, aur jal ki nirmalta, man ki nirmalta ka paryay ban jati hai. Usmen pashu-pakshiyon ki, vibhinn grah-nakshatron ki upasthiti hai, aur varsha ke prsang se to vah varsha-saundarya se aaplavit bhi hai. Unki kavita ki jaden bangbhumi mein, uski bhasha aur sanskriti mein bahut gahri hain, par uski ‘sthanikta’ hardam sarvdeshiy ya sarvajnin hone ki kshamta rakhti hai!
Usmen aadhunikta/samkalinta ki svikriti hai to ek saghan vidambna-bodh bhi hai. Kul milakar usmen khasa vaividhya hai—anubhav kshetron ka, aatmik prtitiyon ka, rachna-vidhiyon ka bhi. Yahi karan hai ki use padhte hue hardam ek tazgi ka, kuchh naya pane ka anubhav hota hai. Ye sanklan unki kavita ke vibhinn charnon ki bangi prastut karne ka ek upakram hai. Sahaj hi hamein ye vishvas hai ki hindi-jagat mein iska bharpur svagat hoga.

Additional Information
Book Type

Hardbound

Publisher Rajkamal Prakashan
Language Hindi
ISBN 978-9387462502
Pages 96p
Publishing Year

Megh Jaisa Manushya

शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है।
उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है!
उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा। Shankh ghosh ki kavita ka svar sandr hai, usmen gahri karuna hai. Aur uski shabd sampda hamein drishyon/paristhitiyon ki ek badi renj ke bich khada kar deti hai—jahan se dainandin jivan ko samajhne-bujhne ke saath, hum srishti aur prkriti ke bahutere marmon ko bhi chihnit kar pate hain. Vah sanketon mein bhi bahut kuchh kahti hai. Bimb to vah kai tarah ke rachti hi hai. Aur upmaon ka jahan-jahan pryog hai, ve anuthi hi hain. Unki kavitaon mein arth-gambhirya hai aur is gambhirya ke srot vinod aur prkhar uktiyon mein bhi chhipe hain. Gahan-gambhir chintan mein to hain hi. Vah un kaviyon mein se hain jinki kavita apni ek vishisht pahchan mano aarambh se aankati aai hai, par apne vishisht svar ki raksha karte hue, vah apne ko har charan mein kuchh ‘naya’ bhi karti aai hai, jismen samajik-sanskritik aur rajnitik paristhitiyon ke ‘gudharth’ bhi padhe ja sakte hain. Usmen ek zabardast naitik aur manviy aagrah hai. Vah manushya-prkriti ke anivarya sambandh ki pakshdhar hai. Uski paryavarniy chintayen bhi hain, aur vah manviy sambandhon mein ek nikhar, parishkar ke saath, unmen ek barabri ki aakankshi hai. Unki kavita mein jal-janit bimb bar-bar lautte hain. Jal-dhara, aur jalashay—sirf pokhar-tal tak simit nahin hain, unmen jal ke aashay nihit hain, aur jal ki nirmalta, man ki nirmalta ka paryay ban jati hai. Usmen pashu-pakshiyon ki, vibhinn grah-nakshatron ki upasthiti hai, aur varsha ke prsang se to vah varsha-saundarya se aaplavit bhi hai. Unki kavita ki jaden bangbhumi mein, uski bhasha aur sanskriti mein bahut gahri hain, par uski ‘sthanikta’ hardam sarvdeshiy ya sarvajnin hone ki kshamta rakhti hai!
Usmen aadhunikta/samkalinta ki svikriti hai to ek saghan vidambna-bodh bhi hai. Kul milakar usmen khasa vaividhya hai—anubhav kshetron ka, aatmik prtitiyon ka, rachna-vidhiyon ka bhi. Yahi karan hai ki use padhte hue hardam ek tazgi ka, kuchh naya pane ka anubhav hota hai. Ye sanklan unki kavita ke vibhinn charnon ki bangi prastut karne ka ek upakram hai. Sahaj hi hamein ye vishvas hai ki hindi-jagat mein iska bharpur svagat hoga.