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Madhya Prant Aur Barar Mein Adivasi Samsyayen

W.V. Grigson

Rs. 1,500 Rs. 1,335

जनजातीय समाज की अवहेलना सदियों से की जाती रही है और मौजूदा समय में भी बरकरार है, जिनकी अनगिनत समस्याओं को दरकिनार कर उनकी ज़मीनों के मालिकाना हक़ों को उनसे सरकारी या ग़ैर-सरकारी तरीक़ों से हड़पा जाता रहा है। उनकी कठिनाइयों और समस्याओं का सूक्ष्म दृष्टि से आकलन करता यह... Read More

Description

जनजातीय समाज की अवहेलना सदियों से की जाती रही है और मौजूदा समय में भी बरकरार है, जिनकी अनगिनत समस्याओं को दरकिनार कर उनकी ज़मीनों के मालिकाना हक़ों को उनसे सरकारी या ग़ैर-सरकारी तरीक़ों से हड़पा जाता रहा है। उनकी कठिनाइयों और समस्याओं का सूक्ष्म दृष्टि से आकलन करता यह दस्तावेज़ हमारे सम्मुख उस जीवन-दृश्य को प्रस्तुत करता है, जो नारकीय है।
प्रस्तुत पुस्तक मध्यप्रान्त और बरार में रहनेवाले जनजातीय समाज की उन विषम समस्याओं से हमें अवगत कराती है कि कैसे समय-समय पर उनकी ज़मीनों, परम्पराओं, भाषाओं से अलग-थलग करके उन्हें ‘निम्न’ जाँचा गया है और कैसे उन्हें साहूकारी के पंजों में फँसाकर बँधुआ मज़दूरी के लिए बाध्य किया गया है।
यहाँ उनकी समस्याओं का एक गम्भीर विश्लेषण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशु-चिकित्सा आदि के नाम पर उन पर जबरन एक ‘सिस्टम’ थोपा गया जिससे उनकी समस्याएँ कम होने के बजाय और बढ़ी हैं।
डब्ल्यू.वी. ग्रिग्सन की अंग्रेज़ी पुस्तक से अनूदित यह पुस्तक जहाँ एक तरफ़ जनजातीय समस्याओं पर केन्द्रित हिन्दी पुस्तकों के अभाव को दूर करती है, वहीं दूसरी ओर शोधकर्ताओं और समाज के उत्थान में जुटे कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन भी करती है। Janjatiy samaj ki avhelna sadiyon se ki jati rahi hai aur maujuda samay mein bhi barakrar hai, jinki anaginat samasyaon ko darakinar kar unki zaminon ke malikana haqon ko unse sarkari ya gair-sarkari tariqon se hadpa jata raha hai. Unki kathinaiyon aur samasyaon ka sukshm drishti se aaklan karta ye dastavez hamare sammukh us jivan-drishya ko prastut karta hai, jo narkiy hai. Prastut pustak madhyaprant aur barar mein rahnevale janjatiy samaj ki un visham samasyaon se hamein avgat karati hai ki kaise samay-samay par unki zaminon, parampraon, bhashaon se alag-thalag karke unhen ‘nimn’ jancha gaya hai aur kaise unhen sahukari ke panjon mein phansakar bandhua mazduri ke liye badhya kiya gaya hai.
Yahan unki samasyaon ka ek gambhir vishleshan hai. Shiksha, svasthya, krishi, pashu-chikitsa aadi ke naam par un par jabran ek ‘sistam’ thopa gaya jisse unki samasyayen kam hone ke bajay aur badhi hain.
Dablyu. Vi. Grigsan ki angrezi pustak se anudit ye pustak jahan ek taraf janjatiy samasyaon par kendrit hindi pustkon ke abhav ko dur karti hai, vahin dusri or shodhkartaon aur samaj ke utthan mein jute karykartaon ka margdarshan bhi karti hai.