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Madhukar Shah : Bundelkhand Ka Nayak

Govind Namdev

Rs. 295 Rs. 263

भारत के स्वतंत्रता-आन्दोलन के ऐसे न जाने कितने अध्याय होंगे, जो इतिहास के पन्नों पर अपनी जगह नहीं बना पाए। देश के दूर-दराज़ हिस्सों में जनसाधारण ने अपने दम पर विदेशी शासकों से कैसे लोहा लिया, क्या-क्या झेला, उस सबको क़लमबन्द करने की उस समय न किसी को इच्छा थी,... Read More

Description

भारत के स्वतंत्रता-आन्दोलन के ऐसे न जाने कितने अध्याय होंगे, जो इतिहास के पन्नों पर अपनी जगह नहीं बना पाए। देश के दूर-दराज़ हिस्सों में जनसाधारण ने अपने दम पर विदेशी शासकों से कैसे लोहा लिया, क्या-क्या झेला, उस सबको क़लमबन्द करने की उस समय न किसी को इच्छा थी, न अवसर। लेकिन पीढ़ियों तक जीवित रहनेवाली किंवदन्तियों में इतिहास के ऐसे अदेखे सूत्र मिल जाते हैं।
1857 के स्वतंत्रता-संग्राम से पहले 1842 के बुन्देल-विद्रोह का प्रकरण भी ऐसा ही है। लिखित इतिहास में इस विषय पर विस्तार से कहीं कुछ भी उपलब्ध नहीं है, लेकिन कुछ सूचनाएँ अवश्य मिलती हैं। उन्हीं को आधार मानकर जुटाई हुई बाक़ी जानकारी को लेकर इस नाटक की रचना की गई है।
कह सकते हैं कि यह रंगमंच के एक सिद्ध जानकार की क़लम से निकली रचना है, जो इस ऐतिहासिक प्रकरण को इतनी सम्पूर्णता से एक नाटक में बदलती है कि इसे पढ़ना भी इसे देखने जैसा ही अनुभव होता है।
बुन्देलखण्ड की खाँटी ज़ुबान, अंग्रेज़ अफ़सरों की हिन्दी और लोकगीतों के साथ बुनी गई यह नाट्य-कृति एक समग्र नाट्य-अनुभव रचती है। Bharat ke svtantrta-andolan ke aise na jane kitne adhyay honge, jo itihas ke pannon par apni jagah nahin bana paye. Desh ke dur-daraz hisson mein jansadharan ne apne dam par videshi shaskon se kaise loha liya, kya-kya jhela, us sabko qalamband karne ki us samay na kisi ko ichchha thi, na avsar. Lekin pidhiyon tak jivit rahnevali kinvdantiyon mein itihas ke aise adekhe sutr mil jate hain. 1857 ke svtantrta-sangram se pahle 1842 ke bundel-vidroh ka prakran bhi aisa hi hai. Likhit itihas mein is vishay par vistar se kahin kuchh bhi uplabdh nahin hai, lekin kuchh suchnayen avashya milti hain. Unhin ko aadhar mankar jutai hui baqi jankari ko lekar is natak ki rachna ki gai hai.
Kah sakte hain ki ye rangmanch ke ek siddh jankar ki qalam se nikli rachna hai, jo is aitihasik prakran ko itni sampurnta se ek natak mein badalti hai ki ise padhna bhi ise dekhne jaisa hi anubhav hota hai.
Bundelkhand ki khanti zuban, angrez afasron ki hindi aur lokgiton ke saath buni gai ye natya-kriti ek samagr natya-anubhav rachti hai.