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Lokdeo Nehru : Dinkar Granthmala

Ramdhari Singh Dinkar

Rs. 495 Rs. 441

Lokbharti Prakashan

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक है 'लोकदेव नेहरू'। पंडित नेहरू के राजनीतिक और अन्तरंग जीवन के कई अनछुए पहलुओं को जिस निकटता से प्रस्तुत करती है यह पुस्तक, वह केवल दिनकर जी के ही वश की बात लगती है। दिनकर जी ने 'लोकदेव' शब्द विनोबा जी से... Read More

Description

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक है 'लोकदेव नेहरू'। पंडित नेहरू के राजनीतिक और अन्तरंग जीवन के कई अनछुए पहलुओं को जिस निकटता से प्रस्तुत करती है यह पुस्तक, वह केवल दिनकर जी के ही वश की बात लगती है।
दिनकर जी ने 'लोकदेव' शब्द विनोबा जी से लिया था जिसे उन्होंने नेहरू जी की श्रद्धांजलि के अवसर पर व्यक्त किया था। दिनकर जी का मानना भी है कि 'पंडित जी, सचमुच ही, भारतीय जनता के देवता थे।'
जैसे परमहंस रामकृष्णदेव की कथा चलाए बिना स्वामी विवेकानन्द का प्रसंग पूरा नहीं होता, वैसे ही गांधी जी की कथा चलाए बिना नेहरू जी का प्रसंग अधूरा छूट जाता है। इसीलिए इस पुस्तक में एक लम्बे विवरण में यह समझाने की कोशिश गई है कि इन दो महापुरुषों के पारस्परिक सम्बन्ध कैसे थे और गांधी जी के दर्पण में नेहरू जी का रूप कैसा दिखाई देता है।
गांधी जी और नेहरू जी के प्रसंग में स्तालिन की चर्चा, वैसे तो बिलकुल बेतुकी-सी लगती है, लेकिन नेहरू जी के जीवन-काल में छिपे-छिपे यह कानाफूसी भी चलती थी कि उनके भीतर तानाशाही की भी थोड़ी-बहुत प्रवृत्ति है। अत: इस पुस्तक में पाठक नेहरू जी के प्रति दिनकर जी के आलोचनात्मक आकलन से भी अवगत होंगे। वस्तुत: दिनकर जी के शब्दों में कहें तो 'यह पुस्तक पंडित जी के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि है।' Ramdhari sinh ‘dinkar’ ki ek atyant mahattvpurn pustak hai lokdev nehru. Pandit nehru ke rajnitik aur antrang jivan ke kai anachhue pahaluon ko jis nikatta se prastut karti hai ye pustak, vah keval dinkar ji ke hi vash ki baat lagti hai. Dinkar ji ne lokdev shabd vinoba ji se liya tha jise unhonne nehru ji ki shraddhanjali ke avsar par vyakt kiya tha. Dinkar ji ka manna bhi hai ki pandit ji, sachmuch hi, bhartiy janta ke devta the.
Jaise paramhans ramkrishndev ki katha chalaye bina svami vivekanand ka prsang pura nahin hota, vaise hi gandhi ji ki katha chalaye bina nehru ji ka prsang adhura chhut jata hai. Isiliye is pustak mein ek lambe vivran mein ye samjhane ki koshish gai hai ki in do mahapurushon ke parasprik sambandh kaise the aur gandhi ji ke darpan mein nehru ji ka rup kaisa dikhai deta hai.
Gandhi ji aur nehru ji ke prsang mein stalin ki charcha, vaise to bilkul betuki-si lagti hai, lekin nehru ji ke jivan-kal mein chhipe-chhipe ye kanaphusi bhi chalti thi ki unke bhitar tanashahi ki bhi thodi-bahut prvritti hai. At: is pustak mein pathak nehru ji ke prati dinkar ji ke aalochnatmak aaklan se bhi avgat honge. Vastut: dinkar ji ke shabdon mein kahen to ye pustak pandit ji ke prati vinamr shraddhanjali hai.