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Krishnavtar : Vol. 7 : Yudhishthir

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सुविख्यात गुजराती उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की बहुचर्चित और बहुपठित उपन्यास-माला ‘कृष्णावतार’ के पूर्वप्रकाशित छह खंडों—‘बंसी की धुन’, ‘रुक्मिणी हरण’, ‘पाँच पाण्डव’, ‘महाबली भीम’, ‘सत्यभामा’ तथा ‘महामुनि व्यास’—के बाद ‘युधिष्ठिर’ नामक यह सातवाँ खंड है। साथ ही आठवाँ, किन्तु अधूरा खंड ‘कुरुक्षेत्र’ भी। मुंशी जी इससे इस ग्रन्थमाला का समापन... Read More

Description

सुविख्यात गुजराती उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की बहुचर्चित और बहुपठित उपन्यास-माला ‘कृष्णावतार’ के पूर्वप्रकाशित छह खंडों—‘बंसी की धुन’, ‘रुक्मिणी हरण’, ‘पाँच पाण्डव’, ‘महाबली भीम’, ‘सत्यभामा’ तथा ‘महामुनि व्यास’—के बाद ‘युधिष्ठिर’ नामक यह सातवाँ खंड है। साथ ही आठवाँ, किन्तु अधूरा खंड ‘कुरुक्षेत्र’ भी। मुंशी जी इससे इस ग्रन्थमाला का समापन करनेवाले थे।
‘महाभारत’ में युधिष्ठिर ‘धर्मराज’ के रूप में विख्यात इतिहासपुरुष हैं। अधर्म, अशान्ति और रक्तपात से उन्हें घोर विरक्ति है। उनकी राजनीति धर्म-साधना का माध्यम-भर है—धर्म को उसका साधन नहीं बनाया जा सकता। यह जानते हुए भी कि कौरव उनका और उनके भाइयों का सर्वस्व हड़प जाना चाहते हैं, युद्ध उन्हें स्वीकार्य नहीं। यही कारण है कि दुर्योधन और शकुनि के षड्यंत्र को जानते हुए भी वे द्यूतसभा का बुलावा स्वीकार कर लेते हैं और भाइयों आदि के निषेध के बावजूद लगातार हारते चले जाते हैं। उपन्यास में इस समूचे घटनाक्रम के दौरान युधिष्ठिर के अन्तर्द्वन्द्व और बेचैनी का मार्मिक अंकन हुआ है। वनवास और अज्ञातवास के बावजूद अन्ततः उन्हें ‘कुरुक्षेत्र’ जाना पड़ा।
और ‘कुरुक्षेत्र’ अधूरा है—यहाँ और जीवन, दोनों जगह। पता नहीं, कब से यह कुरुक्षेत्र हमारे बाहर-भीतर अपूर्ण है और कब तक रहेगा? पर शायद मानव-विकास का बीज भी इसी अपूर्णता में निहित है। Suvikhyat gujrati upanyaskar kanhaiyalal maniklal munshi ki bahucharchit aur bahupthit upanyas-mala ‘krishnavtar’ ke purvaprkashit chhah khandon—‘bansi ki dhun’, ‘rukmini haran’, ‘panch pandav’, ‘mahabli bhim’, ‘satybhama’ tatha ‘mahamuni vyas’—ke baad ‘yudhishthir’ namak ye satvan khand hai. Saath hi aathvan, kintu adhura khand ‘kurukshetr’ bhi. Munshi ji isse is granthmala ka samapan karnevale the. ‘mahabharat’ mein yudhishthir ‘dharmraj’ ke rup mein vikhyat itihasapurush hain. Adharm, ashanti aur raktpat se unhen ghor virakti hai. Unki rajniti dharm-sadhna ka madhyam-bhar hai—dharm ko uska sadhan nahin banaya ja sakta. Ye jante hue bhi ki kaurav unka aur unke bhaiyon ka sarvasv hadap jana chahte hain, yuddh unhen svikarya nahin. Yahi karan hai ki duryodhan aur shakuni ke shadyantr ko jante hue bhi ve dyutasbha ka bulava svikar kar lete hain aur bhaiyon aadi ke nishedh ke bavjud lagatar harte chale jate hain. Upanyas mein is samuche ghatnakram ke dauran yudhishthir ke antardvandv aur bechaini ka marmik ankan hua hai. Vanvas aur agyatvas ke bavjud antatः unhen ‘kurukshetr’ jana pada.
Aur ‘kurukshetr’ adhura hai—yahan aur jivan, donon jagah. Pata nahin, kab se ye kurukshetr hamare bahar-bhitar apurn hai aur kab tak rahega? par shayad manav-vikas ka bij bhi isi apurnta mein nihit hai.