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Keshar Kasturi

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शिवमूर्ति को पढ़ने का अर्थ है—उत्तर भारत के गाँवों को समग्रता में जानना। गाँव ही शिवमूर्ति की प्रकृत लीला-भूमि है। इसी पर केन्द्रित होकर उनका कथाकार दूर-दूर तक मँडराता है। गाँव के रीति-रिवाज, ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग, जड़ों में धँसे संस्कार, प्रकृत यौन-बुभुक्षा, परत-दर-परत उजागर होता वर्णवादी-वर्गवादी शोषण, मूल्यहीन राजनीति और उनके... Read More

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Description

शिवमूर्ति को पढ़ने का अर्थ है—उत्तर भारत के गाँवों को समग्रता में जानना। गाँव
ही शिवमूर्ति की प्रकृत लीला-भूमि है। इसी पर केन्द्रित होकर उनका कथाकार दूर-दूर तक मँडराता है।
गाँव के रीति-रिवाज, ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग, जड़ों में धँसे संस्कार, प्रकृत यौन-बुभुक्षा, परत-दर-परत
उजागर होता वर्णवादी-वर्गवादी शोषण, मूल्यहीन राजनीति और उनके बीच भटकती लाचार
ज़िन्दगियाँ...
प्रकृतिवाद में शिवमूर्ति जोला के आस-पास दीखते हैं तो पात्रों के जीवन्त चित्रण में गोर्की के समीप।
संवादों की ध्वन्यात्मकता से वे सतीनाथ भादुड़ी और रेणु की याद दिलाते हैं तो बिम्ब-विधान में जैक
लंडन की। पर इन सबके बावजूद शिवमूर्ति का जो ‘अपना’ है, वह कहीं और नहीं।
लोग हैरान रह जाते हैं यह देखकर कि जब स्वयं जनवादियों की कहानियों से ‘जन’ दिनों-दिन दूर
होते जा रहे हैं, बिना घोषित जनवादी हुए शिवमूर्ति की कहानियाँ जन के इतने क़रीब कैसे हैं?
शिवमूर्ति के साथ ही हिन्दी कहानी में पुनः कथारस की वापसी हुई है। आज जब कहानी में
पठनीयता के संकट का सवाल उठा हुआ है, शिवमूर्ति इस सवाल का मुकम्मल जवाब हैं।0. Shivmurti ko padhne ka arth hai—uttar bharat ke ganvon ko samagrta mein janna. GanvHi shivmurti ki prkrit lila-bhumi hai. Isi par kendrit hokar unka kathakar dur-dur tak mandrata hai.
Ganv ke riti-rivaj, iirshya-dvesh, rag-virag, jadon mein dhanse sanskar, prkrit yaun-bubhuksha, parat-dar-parat
Ujagar hota varnvadi-vargvadi shoshan, mulyhin rajniti aur unke bich bhatakti lachar
Zindagiyan. . .
Prakritivad mein shivmurti jola ke aas-pas dikhte hain to patron ke jivant chitran mein gorki ke samip.
Sanvadon ki dhvanyatmakta se ve satinath bhadudi aur renu ki yaad dilate hain to bimb-vidhan mein jaik
Landan ki. Par in sabke bavjud shivmurti ka jo ‘apna’ hai, vah kahin aur nahin.
Log hairan rah jate hain ye dekhkar ki jab svayan janvadiyon ki kahaniyon se ‘jan’ dinon-din dur
Hote ja rahe hain, bina ghoshit janvadi hue shivmurti ki kahaniyan jan ke itne qarib kaise hain?
Shivmurti ke saath hi hindi kahani mein punः katharas ki vapsi hui hai. Aaj jab kahani mein
Pathniyta ke sankat ka saval utha hua hai, shivmurti is saval ka mukammal javab hain. 0.