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Kavita Ke Naye Pratiman

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‘कविता के नए प्रतिमान’ में समकालीन हिन्दी आलोचना के अन्तर्गत व्याप्त मूल्यान्ध वातावरण का विश्लेषण करते हुए उन काव्यमूल्यों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जो आज की स्थिति के लिए प्रासंगिक हैं। प्रथम खंड के अन्तर्गत विशेषतः ‘तारसप्तक’, ‘कामायनी’, ‘उर्वशी’ आदि कृतियों और सामान्यतः छायावादोत्तर कविता की... Read More

Description

‘कविता के नए प्रतिमान’ में समकालीन हिन्दी आलोचना के अन्तर्गत व्याप्त मूल्यान्ध वातावरण का विश्लेषण करते हुए उन काव्यमूल्यों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जो आज की स्थिति के लिए प्रासंगिक हैं।
प्रथम खंड के अन्तर्गत विशेषतः ‘तारसप्तक’, ‘कामायनी’, ‘उर्वशी’ आदि कृतियों और सामान्यतः छायावादोत्तर कविता की उपलब्धियों को लेकर पिछले दो दशकों में जो विवाद हुए हैं, उनमें टकरानेवाले मूल्यों की पड़ताल की गई है; और इस प्रसंग में नए दावे के साथ प्रस्तुत ‘रस सिद्धान्त’ की प्रसंगानुकूलता पर भी विचार किया गया है।
दूसरे खंड में ‘कविता के नए प्रतिमान’ के नाम पर प्रस्तुत अनुभूति की ‘प्रामाणिकता’, ‘ईमानदारी’, ‘जटिलता’, ‘द्वन्द्व’, ‘तनाव’, ‘विसंगति’, ‘विडम्बना’, ‘सर्जनात्मक भाषा’, ‘बिम्बात्मकता’, ‘सपाटबयानी’, ‘फ़ैंटेसी’, ‘नाटकीयता’ आदि आलोचनात्मक पदों की सार्थकता का परीक्षण किया गया है। इस प्रक्रिया में यथाप्रसंग कुछ कविताओं की संक्षिप्त अर्थमीमांसा भी की गई है, जिनसे लेखक द्वारा समर्थित काव्य-मूल्यों की प्रतीति होती है।
निष्कर्ष स्वरूप नए प्रतिमान एक जगह सूत्रबद्ध नहीं हैं, क्योंकि लेखक इस प्रकार के रूढ़ि-निर्माण को अनुपयोगी ही नहीं, बल्कि घातक समझता है। मुख्य बल काव्यार्थ ग्रहण की उस प्रक्रिया पर है जो अनुभव के खुलेपन के बावजूद सही अर्थमीमांसा के द्वारा मूल्यबोध के विकास में सहायक होती है। ‘kavita ke ne pratiman’ mein samkalin hindi aalochna ke antargat vyapt mulyandh vatavran ka vishleshan karte hue un kavymulyon ko rekhankit karne ka pryas kiya gaya hai jo aaj ki sthiti ke liye prasangik hain. Prtham khand ke antargat visheshatः ‘tarsaptak’, ‘kamayni’, ‘urvshi’ aadi kritiyon aur samanyatः chhayavadottar kavita ki uplabdhiyon ko lekar pichhle do dashkon mein jo vivad hue hain, unmen takranevale mulyon ki padtal ki gai hai; aur is prsang mein ne dave ke saath prastut ‘ras siddhant’ ki prsanganukulta par bhi vichar kiya gaya hai.
Dusre khand mein ‘kavita ke ne pratiman’ ke naam par prastut anubhuti ki ‘pramanikta’, ‘iimandari’, ‘jatilta’, ‘dvandv’, ‘tanav’, ‘visangati’, ‘vidambna’, ‘sarjnatmak bhasha’, ‘bimbatmakta’, ‘sapatabyani’, ‘faintesi’, ‘natkiyta’ aadi aalochnatmak padon ki sarthakta ka parikshan kiya gaya hai. Is prakriya mein yathaprsang kuchh kavitaon ki sankshipt arthmimansa bhi ki gai hai, jinse lekhak dvara samarthit kavya-mulyon ki prtiti hoti hai.
Nishkarsh svrup ne pratiman ek jagah sutrbaddh nahin hain, kyonki lekhak is prkar ke rudhi-nirman ko anupyogi hi nahin, balki ghatak samajhta hai. Mukhya bal kavyarth grhan ki us prakriya par hai jo anubhav ke khulepan ke bavjud sahi arthmimansa ke dvara mulybodh ke vikas mein sahayak hoti hai.