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Kaal Ki Vaigyanik Avdharna

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काल को किसी सरल व्याख्या में समेटना लगभग असम्भव है। प्रकृति की जिन शक्तियों ने मानव-मन को सबसे ज्‍़यादा आतंकित-विचलित किया है, काल अर्थात् समय उनमें सबसे प्रबल और रहस्यमय है। इसी काल को समझने के क्रम में कैलेंडरों, पंचांगों, तिथियों आदि का विकास हुआ। कल्पों, युगों, सदियों, वर्षों, महीनों,... Read More

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Description

काल को किसी सरल व्याख्या में समेटना लगभग असम्भव है। प्रकृति की जिन शक्तियों ने मानव-मन को सबसे ज्‍़यादा आतंकित-विचलित किया है, काल अर्थात् समय उनमें सबसे प्रबल और रहस्यमय है। इसी काल को समझने के क्रम में कैलेंडरों, पंचांगों, तिथियों आदि का विकास हुआ। कल्पों, युगों, सदियों, वर्षों, महीनों, दिनों और घंटों की इकाइयों का आविर्भाव हुआ। लेकिन काल क्या है, इसका कोई बहुत सरल तथा अन्तिम उत्तर आज भी किसी के पास नहीं होता है। हम काल में जीते हैं, उसे अनुभव करते हैं, लेकिन वह है क्या, इसको व्याख्यायित नहीं कर सकते।
लोकप्रिय विज्ञान-लेखक गुणाकर मुळे की इस पुस्तक में संगृहीत काल की वैज्ञानिक अवधारणा से सम्‍बन्धित उनके निबन्धों में काल को अलग-अलग आयामों से समझने का प्रयास किया गया है, साथ ही काल-सम्बन्धी चिन्तन के इतिहास तथा कैलेंडरों और पंचांगों के अस्तित्व में आने का वैज्ञानिक ब्यौरा भी दिया गया है। 'काल क्या है?', 'काल का इतिहास', 'कैलेंडरों की कहानी', 'प्राचीन काल के कैलेंडर', 'काल की वैज्ञानिक अवधारणा' तथा 'काल मापने के अन्तरराष्ट्रीय तरीक़े' जैसे समय की सत्ता को अलग-अलग दिशा से जानते-समझते अठारह आलेख इस पुस्तक को हर वर्ग के पाठक के लिए पठनीय तथा संग्रहणीय बनाते हैं। Kaal ko kisi saral vyakhya mein sametna lagbhag asambhav hai. Prkriti ki jin shaktiyon ne manav-man ko sabse ‍yada aatankit-vichlit kiya hai, kaal arthat samay unmen sabse prbal aur rahasymay hai. Isi kaal ko samajhne ke kram mein kailendron, panchangon, tithiyon aadi ka vikas hua. Kalpon, yugon, sadiyon, varshon, mahinon, dinon aur ghanton ki ikaiyon ka aavirbhav hua. Lekin kaal kya hai, iska koi bahut saral tatha antim uttar aaj bhi kisi ke paas nahin hota hai. Hum kaal mein jite hain, use anubhav karte hain, lekin vah hai kya, isko vyakhyayit nahin kar sakte. Lokapriy vigyan-lekhak gunakar muळe ki is pustak mein sangrihit kaal ki vaigyanik avdharna se sam‍bandhit unke nibandhon mein kaal ko alag-alag aayamon se samajhne ka pryas kiya gaya hai, saath hi kal-sambandhi chintan ke itihas tatha kailendron aur panchangon ke astitv mein aane ka vaigyanik byaura bhi diya gaya hai. Kal kya hai?, kal ka itihas, kailendron ki kahani, prachin kaal ke kailendar, kal ki vaigyanik avdharna tatha kal mapne ke antarrashtriy tariqe jaise samay ki satta ko alag-alag disha se jante-samajhte atharah aalekh is pustak ko har varg ke pathak ke liye pathniy tatha sangrahniy banate hain.