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Jamuni

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मिथिलेश्वर ग्रामीण परिवेश के सशक्त कथाकार हैं। उनकी लम्बी कहानी ‘जमुनी’ को कृषक-जीवन की महागाथा कहा जा सकता है, जिसमें एक सामान्य भारतीय कृषक परिवार के प्रेम-घृणा, आस्था-विश्वास, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, सम्पत्ति-विपत्ति और उत्थान-पतन का मार्मिक एवं सजीव चित्र प्रस्तुत किया गया है...। शिल्प का रचाव निश्चय ही कहानी को महत्त्वपूर्ण... Read More

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Description

मिथिलेश्वर ग्रामीण परिवेश के सशक्त कथाकार हैं। उनकी लम्बी कहानी ‘जमुनी’ को कृषक-जीवन की महागाथा कहा जा सकता है, जिसमें एक सामान्य भारतीय कृषक परिवार के प्रेम-घृणा, आस्था-विश्वास, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, सम्पत्ति-विपत्ति और उत्थान-पतन का मार्मिक एवं सजीव चित्र प्रस्तुत किया गया है...। शिल्प का रचाव निश्चय ही कहानी को महत्त्वपूर्ण बना देता है, किन्तु कहीं-कहीं अनायास सादगी ही शिल्प का शृंगार बन जाती है। प्रेमचन्द का कथाशिल्प ऐसा ही था। वर्तमान कथाकारों में मिथिलेश्वर का कथाशिल्प भी इसी प्रकार का है।’’
—डॉ. राकेश गुप्त एवं डॉ. ऋषिकुमार चतुर्वेदी ‘हिन्दी कहानी 1991-95’, खंड-2 का भूमिकांश
शीर्षक कथा ‘जमुनी’ एक लम्बी कहानी है जिसमें एक कृषक परिवार का संघर्ष जीवन्त हो उठता है और जहाँ अपनी भूख-प्यास और नींद-आराम को दरकिनार करते हुए हर एक की चिन्ता बीमार भैंस को मृत्यु के मुख में जाने से बचाने की है, क्योंकि वह भैंस ही उनकी सुख-समृद्धि का केन्द्र है।
‘जमुनी’ के अतिरिक्त इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी जीवन और जगत के जरूरी सवालों के जवाब तलाशती अमिट प्रभाव क़ायम करनेवाली कहानियाँ हैं। निःसन्देह, यह कहानी-संग्रह समर्थ कथाशिल्पी मिथिलेश्वर के प्रौढ़ कथा-लेखन की सार्थक यात्रा का द्योतक है। ‘बाबूजी’ के कथाकार ने अपने लेखकीय नैरन्तैर्य और श्रेष्ठ कथा-लेखन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट मौजूदगी का एहसास कराते हुए हिन्दी कथा-जगत को और अधिक ऊर्जस्वित और विकसित किया है...। Mithileshvar gramin parivesh ke sashakt kathakar hain. Unki lambi kahani ‘jamuni’ ko krishak-jivan ki mahagatha kaha ja sakta hai, jismen ek samanya bhartiy krishak parivar ke prem-ghrina, aastha-vishvas, aasha-nirasha, harsh-vishad, sampatti-vipatti aur utthan-patan ka marmik evan sajiv chitr prastut kiya gaya hai. . . . Shilp ka rachav nishchay hi kahani ko mahattvpurn bana deta hai, kintu kahin-kahin anayas sadgi hi shilp ka shringar ban jati hai. Premchand ka kathashilp aisa hi tha. Vartman kathakaron mein mithileshvar ka kathashilp bhi isi prkar ka hai. ’’—dau. Rakesh gupt evan dau. Rishikumar chaturvedi ‘hindi kahani 1991-95’, khand-2 ka bhumikansh
Shirshak katha ‘jamuni’ ek lambi kahani hai jismen ek krishak parivar ka sangharsh jivant ho uthta hai aur jahan apni bhukh-pyas aur nind-aram ko darakinar karte hue har ek ki chinta bimar bhains ko mrityu ke mukh mein jane se bachane ki hai, kyonki vah bhains hi unki sukh-samriddhi ka kendr hai.
‘jamuni’ ke atirikt is sangrah ki anya kahaniyan bhi jivan aur jagat ke jaruri savalon ke javab talashti amit prbhav qayam karnevali kahaniyan hain. Niःsandeh, ye kahani-sangrah samarth kathashilpi mithileshvar ke praudh katha-lekhan ki sarthak yatra ka dyotak hai. ‘babuji’ ke kathakar ne apne lekhkiy nairantairya aur shreshth katha-lekhan ke kshetr mein apni vishisht maujudgi ka ehsas karate hue hindi katha-jagat ko aur adhik uurjasvit aur viksit kiya hai. . . .