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Chaturbhani

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चतुर्भाणी’ एक विलक्षण क्लैसिक है : मूल में बोलचाल की संस्कृत और लोक-जीवन की छटाओं का रोचक और नाटकीय इज़हार है और अनुवाद में बनारसी बोली का चटपटा रस-भाव। बरसों पहले ब.व. कारन्त ने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए 'चतुर्भाणी’ की रंग-प्रस्तुति की थी। डॉ. मोतीचन्द्र द्वारा अनूदित और... Read More

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Description

चतुर्भाणी’ एक विलक्षण क्लैसिक है : मूल में बोलचाल की संस्कृत और लोक-जीवन की छटाओं का रोचक और नाटकीय इज़हार है और अनुवाद में बनारसी बोली का चटपटा रस-भाव। बरसों पहले ब.व. कारन्त ने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए 'चतुर्भाणी’ की रंग-प्रस्तुति की थी। डॉ. मोतीचन्द्र द्वारा अनूदित और डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा विस्तार से समझाई गई इस कृति को नए संस्करण में प्रस्तुत करते हुए हमें गहरा सन्‍तोष है। भारतीय परम्परा की दुर्व्याख्या के इस अभागे समय में यह कृति याद दिलाती है कि हमारी परम्परा में कैसी रसिकता और लोक-जीवन का उन्मुक्त रचाव रहा है जो कहीं से भी किसी संकीर्णता में बाँधा नहीं जा सकता।
—अशोक वाजपेयी Chaturbhani’ ek vilakshan klaisik hai : mul mein bolchal ki sanskrit aur lok-jivan ki chhataon ka rochak aur natkiy izhar hai aur anuvad mein banarsi boli ka chatapta ras-bhav. Barson pahle ba. Va. Karant ne ujjain ke kalidas samaroh ke liye chaturbhani’ ki rang-prastuti ki thi. Dau. Motichandr dvara anudit aur dau. Vasudevashran agrval dvara vistar se samjhai gai is kriti ko ne sanskran mein prastut karte hue hamein gahra san‍tosh hai. Bhartiy parampra ki durvyakhya ke is abhage samay mein ye kriti yaad dilati hai ki hamari parampra mein kaisi rasikta aur lok-jivan ka unmukt rachav raha hai jo kahin se bhi kisi sankirnta mein bandha nahin ja sakta. —ashok vajpeyi