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Aginkhor

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हिन्दी भाषा फणीश्वरनाथ रेणु की ऋणी है उस शब्द-सम्पदा के लिए जो उन्होंने स्थानीय बोली-परम्परा से लेकर हिन्दी को दी। नितान्त ज़मीन की ख़ुशबू से रचे शब्दों को खड़ी बोली के फ़्रेम में रखकर उन्होंने ऐसे प्रस्तुत किया कि वे उनके पाठकों की स्मृति में हमेशा-हमेशा के लिए जड़े रह... Read More

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Description

हिन्दी भाषा फणीश्वरनाथ रेणु की ऋणी है उस शब्द-सम्पदा के लिए जो उन्होंने स्थानीय बोली-परम्परा से लेकर हिन्दी को दी। नितान्त ज़मीन की ख़ुशबू से रचे शब्दों को खड़ी बोली के फ़्रेम में रखकर उन्होंने ऐसे प्रस्तुत किया कि वे उनके पाठकों की स्मृति में हमेशा-हमेशा के लिए जड़े रह गए। उनके लेखन का अधिकांश इस अर्थ में बार-बार पठनीय है। दूसरे जिस कारण से रेणु को लौट-लौटकर पढ़ना ज़रूरी हो जाता है, वह है उनकी संवेदना और उसे शब्दों में चित्रित करने की उनकी कला। वे भारतीय लोकजीवन और जनसाधारण के अस्तित्व के लिए निर्णायक अहमियत रखनेवाली भावधाराओं को तक़रीबन जादुई ढंग से पकड़ते हैं, और उतनी ही कुशलता से उसे पाठक के सामने प्रस्तुत कर देते हैं। इस संग्रह में ‘अगिनखोर’ के अलावा ‘मिथुन राशि’, ‘अक्ल और भैंस’, ‘रेखाएँ : वृत्तचक्र’, ‘तब शुभ नामे’, ‘एक अकहानी का सुपात्र’, ‘जैव’, ‘मन का रंग’, ‘लफड़ा’, ‘अग्निसंचारक’ और ‘भित्तिचित्र मयूरी’ कहानियाँ शामिल हैं। इन ग्यारह कहानियों में से हर एक कहानी और उसका हर पात्र इस बात का प्रमाण है कि उत्तर भारत, विशेषकर गंगा के तटीय इलाक़ों की ग्राम्य-संवेदना और जीवन को समझने के लिए रेणु का ‘होना’ कितना महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी है। Hindi bhasha phanishvarnath renu ki rini hai us shabd-sampda ke liye jo unhonne sthaniy boli-parampra se lekar hindi ko di. Nitant zamin ki khushbu se rache shabdon ko khadi boli ke frem mein rakhkar unhonne aise prastut kiya ki ve unke pathkon ki smriti mein hamesha-hamesha ke liye jade rah ge. Unke lekhan ka adhikansh is arth mein bar-bar pathniy hai. Dusre jis karan se renu ko laut-lautkar padhna zaruri ho jata hai, vah hai unki sanvedna aur use shabdon mein chitrit karne ki unki kala. Ve bhartiy lokjivan aur jansadharan ke astitv ke liye nirnayak ahamiyat rakhnevali bhavdharaon ko taqriban jadui dhang se pakadte hain, aur utni hi kushalta se use pathak ke samne prastut kar dete hain. Is sangrah mein ‘aginkhor’ ke alava ‘mithun rashi’, ‘akl aur bhains’, ‘rekhayen : vrittchakr’, ‘tab shubh name’, ‘ek akhani ka supatr’, ‘jaiv’, ‘man ka rang’, ‘laphda’, ‘agnisancharak’ aur ‘bhittichitr mayuri’ kahaniyan shamil hain. In gyarah kahaniyon mein se har ek kahani aur uska har patr is baat ka prman hai ki uttar bharat, visheshkar ganga ke tatiy ilaqon ki gramya-sanvedna aur jivan ko samajhne ke liye renu ka ‘hona’ kitna mahattvpurn aur zaruri hai.