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Book Review: Mitti Ki Sundarta Dekho

Book Review: Mitti Ki Sundarta Dekho
सर्वत हुसैन की ग़ज़लें और नज़्मों को नुमायां करने वाली एक किताब "मिट्टी की सुंदरता देखो" जो रेख़्ता बुक्स की ख़ुसूसी इंतख़ाब में से एक हैं.. इस किताब के बारे में और सर्वत के बारे में कुछ बातें करते हैं.. आइए कुछ अश'आर सू शुरूअ' करते हैं..

कोई शां सर-ए-दीवार-ओ-बाम अपना नहीं..

किसी नगर किसी बन में क़याम अपना नहीं..



गीतों में कुछ ख़्वाब थे जाने किसके सुपुर्द किए,

इसी   शहर   की  दीवारों  में  या  बन  में  कहीं..



साथ  रख्खेंगे  उसे  बाग़  की  तन्हाई में,

और फ़व्वारे से गिरता हुआ जल देखेंगे..



रक़्स  में  होगी  एक  परछाई,

दीप जलने के बा'द क्या होगा..



अच्छा सा कोई सपना देखो और मुझे देखो..

जागो  तो  आईना   देखो  और  मुझे  देखो..

बन , जल, दीप, सपना, जीवन, गंभीर, रथ, धान, द्वार, पाताल, पवन, बरखा, कोंपल, हृदय, कल्पना, महान, संदेस, पक्षी.. उर्दू शायरी में हिंदी के ऐसे अल्फ़ाज़‌ का इस्तेमाल जो आपको हैरत में इसलिए डाल देगा क्यूंकि ये अल्फाज़ उर्दू शायरी में बहुत ही दिलचस्प अंदाज़ में शामिल किये गए... जैसे ख़ालिस हिंदी ज़बान का इस्तेमाल कि जो उर्दू शायरी में हुआ और निभाया भी गया हो ऐसा बहुत कम देखने मिलता है.. मैं बात कर रहा हूं सर्वत हुसैन की शायरी की..सर्वत हुसैन 9 नवंबर 1949 को पैदा हुए और वो उन कुछ चुनिंदा परिवारों में से हैं जो बंटवारे के बा'द कराची चले गए..कराची में ही लेक्चरर की हैसियत से काम किया..

इनकी शायरी में बहुत सारी अजीब कैफ़ियात महसूस की जा सकती हैं.. कभी ताज़गी भरा लब-ओ-जहजा, कभी ना-उम्मीद होना, कभी उम्मीद की इंतहा, कभी ख़ूबसूरत मंज़रकशी, कभी ऐसे ख़याल से रूबरू करवाती है इनकी शायरी जिसे सोचते हुए हम ख़ुद ऐसा महसूस करते हैं जैसे हम ख़ुद इनकी शायरी में जी रहे हैं..कुछ अश'आर आपको झंझोड के रख देते हैं तो कुछ ज़ाविये आपको रोज़ाना जिंदगी के तजुर्बात को बयान करते हुए नज़र आते हैं..

इनकी शायरी में एक आशिक़ के लिए दर्द, किसी मुसाफ़िर के लिए किसी जंगल में रौशन चराग़ या एक अजीब ना-उम्मीदी भी पाई गई है जिसको पढ़ते हुए  ऐसा लगता है कि ये ना-उम्मीदी उनके लिखे बाकी ऐहसासात को खा जाएगी पर जैसे ही वर्क़ पलटता है किसी नाविल कि तरह जिसमें एक नए किरदार की पहचान होती है जो ख़ुद अपने आप में एक मक़ाम रखता है.. हर एक सफ़्हे पे आपको एक लज़्ज़त और चाशनी मेहसूस होगी जिसकी वज्ह से आपको एक ग़ज़ल या एक शे'र बार-बार पढ़ने का मन करता है.. नयी बात, नया ज़ाविया और उस्लूब की आ'ला तरीन ताज़गी महसूस होती है जो शायद इनकी शायरी को इन्फ़िरादियत बख़्शती है.. चलिए कुछ और अश'आर से रूबरू होते हैं..

मिलना और बिछड़ जाना किसी रस्ते पर,

इक यही क़िस्सा आदमियों के साथ रहा..



मैंने ख़ुद को जम्अ' किया पच्चीस बरस में,

ये सामान तो मुझसे यक्जा फिर नही होगा..


बदली जो हवाएं तो पलट कर वही आए,

ढूंडा उन्हीं शाख़ों में परिंदों ने घर अपना..


उड़ते बालों की ओट किए हाथों में ज़र्द चराग लिए,

इसी ठंडे फ़र्श के सहरा पर कोई नंगे पैर चला होगा..



आंखें  हैं  और  धूल  भरा  सन्नाटा  है

गुज़र गई है अजब सवारी यादों वाली..

एक तरफ़ इन अश'आर में एक महक महसूस होती है और साथ ही साथ शायरी की अक्कासी भी नज़र आती है.. मुन्फ़रिद लब-ओ-लहजे के साथ इंसानी ज़िंदगी के पेच-ओ-ख़म को शामिल करना वाक़ई शायरी के मे'यार से रूबरू करवाता है.. एक ख़ास बात ये है इनकी अक्सर-ओ-बेशतर ग़ज़लें ऐसी हैं जिनके बीच में से कोई शे'र पढ़ा जाए तो वही रवानी महसूस होती है जितनी लज़्ज़त मुकम्मल ग़ज़ल पढ़ने के दौरान महसूस होती है.. आम तौर पर कुछ शायरों के अश'आर ग़ज़ल मुकम्मल पढ़ने पर खुलते हैं मगर सर्वत की ग़ज़लें पढ़ने पर ऐसा नहीं होता.. फ़र्द शे'र भी पुर-कैफ़ हैं.. कुछ अश'आर जो मुझे बहुत अच्छे लगे वो ये हैं:

लड़की कोई घाट पर खड़ी थी,

पानी  पे ‌चराग़  जल  रहा था..

रस्ता-रस्ता  उगने  वाले  ये  हम-शक्ल दरख़्त,

धूप में हैं और हम जैसों का ध्यान भी रखते हैं..

वही नशेब और वही सितारा कौन है तू हम-राही,

सारा  जंगल   बीत  न  जाए  इसी   उलझन  में..

हवा-ए-ख़िजां  में दरख़्तों की दिल-जुई लाज़िम है सर्वत,

गुरेज़ और गर्दिश का दिन है मगर मुझको रुकना पड़ा है..

वो भी थक कर गिर जाती है मेरे बाज़ू पर,

रफ़्ता-रफ़्ता  मैं भी होश में आने लगता हूं..

आसान उर्दू ज़बान के साथ इनकी शायरी में एक रिवायती लहजा भी पाया जाता है जो इन्हें अदबी गिरोह के कुछ ऐसे शायरों के

साथ शामिल करता है जो मुझे बेहद पसंद हैं.. मसलन इरफ़ान सिद्दीक़ी साहब और जमाल एहसानी साहब..  अगर सर्वत हुसैन की नज़्मों के बारे में बात करें तो ये कहा जा सकता है कि उनकी नज़्मों में एक अलग लम्स है जो इंसानी जज़्बात को अंदर तक छू जाती है.. इनकी एक नज़्म का टुकड़ा देखें:

उन्वान: एक नज़्म कहीं से भी शुरूअ' हो सकती है

एक नज़्म कहीं से भी शुरूअ' हो सकती है

जुतों की जोड़ी से

या कब्र से जो बारिशों में बैठ गई

या उस फूल से जो कब्र की पाएंती पर खिला

हर एक को कहीं न कहीं पनाह मिल गई

च्यूंटियों को जा-ए-नमाज़ के नीचे  

और लड़कियों को मेरी आवाज़ में

मुर्दा बैल की खोपड़ी में गिलहरी ने घर बना लिया है

नज़्म का भी एक घर होगा

किसी जिला-वतन का दिल या इंतज़ार करती हुई आंखें.

9, सितंबर 1994 के दिन उन्होंने दुनिया को रुख़्सत किया.. इनकी कुछ किताबों के नाम: आधे सय्यारे पर, खाकदान, एक कटोरा पानी.. आख़िर में एक नज़्म है जिसके साथ मैं अपनी बात ख़त्म करता हूं..

उन्वान: मैं तुम्हें क्या दे सकता हूं

मैं तुम्हें क्या दे सकता हूं तरबूज़ की एक काश जिस पर हमारे बच्चों ने दांत गाड़ दिए हैं

एक जाल जिसे चूहों ने जगह जगह से कुतर लिया है

नज़्मों की एक किताब जिसे घड़ौंची की बुनियाद में दफ़्न कर दिया गया

एक पालना जिस की रस्सियां काट दी गईं

एक कूची जो पिछले तीस साल से रंगों में डूबी हुई है

जक नाम जिससे मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूं

मैं तुम्हें क्या दे सकता हूं उस हवादार मकान के सिवा

जहां सर चीज़ तुम्हारा इंतज़ार कर रही है..
- उवैस गिराच

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