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Valmiki Ki Paryavaran Chetna-3 Jeev Jantu

Mahendra Pratap Singh

Rs. 595 Rs. 536

Vani Prakashan

जब हम अपने किसी मित्र, सम्बन्धी या सुब्द से मिलते हैं तो सभी का हालचाल पूछते हैं। किसी से मिलकर हम उसके बच्चों, परिवार आदि की ही कुशल पूछते हैं। हम सबने कभी सोचा ही नहीं कि किसी की हाल चाल पूछते समय उस क्षेत्र के वनों, नदियों, तालाबों या... Read More

Description

जब हम अपने किसी मित्र, सम्बन्धी या सुब्द से मिलते हैं तो सभी का हालचाल पूछते हैं। किसी से मिलकर हम उसके बच्चों, परिवार आदि की ही कुशल पूछते हैं। हम सबने कभी सोचा ही नहीं कि किसी की हाल चाल पूछते समय उस क्षेत्र के वनों, नदियों, तालाबों या वन्यजीवों का समाचार जानने की चेष्टा करें। ऐसा इसलिए है कि अब हम वनों, नदियों, तालाबों या वन्यजीवों को परिवार का अंग मानते ही नहीं। पहले ऐसा नहीं था। उस समय लोग एक दूसरे का समाचार पूछते समय वनों, बागों, जलस्रोतों आदि की भी कुशलता जानना चाहते थे। इसका कारण यह था कि उस समय लोग प्रकृति के विभिन्न अवयवों को परिवार की सीमा के अन्तर्गत ही मानते थे। jab hum apne kisi mitr, sambandhi ya subd se milte hain to sabhi ka halchal puchhte hain. kisi se milkar hum uske bachchon, parivar aadi ki hi kushal puchhte hain. hum sabne kabhi socha hi nahin ki kisi ki haal chaal puchhte samay us kshetr ke vanon, nadiyon, talabon ya vanyjivon ka samachar janne ki cheshta karen. aisa isaliye hai ki ab hum vanon, nadiyon, talabon ya vanyjivon ko parivar ka ang mante hi nahin. pahle aisa nahin tha. us samay log ek dusre ka samachar puchhte samay vanon, bagon, jalasroton aadi ki bhi kushalta janna chahte the. iska karan ye tha ki us samay log prkriti ke vibhinn avayvon ko parivar ki sima ke antargat hi mante the.