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Tat Ki Khoj

Harishankar Parsai

Rs. 60

Vani Prakashan

एक दिन किसी विवाह के इच्छुक वर के पिता मुझे देखने आये। आशा और निराशा के बीच झूलते, पिताजी तीन दिन से घर की तैयारी कर रहे थे। मकान की सफाई की गई, सजावट की गई, साथ ही मुझे भी सजाया गया। ऐसे अवसर पर घर में किसी वृद्धा का... Read More

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Description
एक दिन किसी विवाह के इच्छुक वर के पिता मुझे देखने आये। आशा और निराशा के बीच झूलते, पिताजी तीन दिन से घर की तैयारी कर रहे थे। मकान की सफाई की गई, सजावट की गई, साथ ही मुझे भी सजाया गया। ऐसे अवसर पर घर में किसी वृद्धा का होना आवश्यक है, इसलिए मेरी एक दूर के रिश्ते की फूफी को तीन दिन के लिए इस घर में बसाया गया। मेरी परीक्षा का दिन आया। सवेरे से ही घर में बड़ी हलचल मच गई। वृद्धा फूफी ने मेरा शृंगार किया और मुझे उन लोगों के सामने कैसे चलना चाहिए, कैसे बात करनी चाहिए, यह सब सिखाया गया। कुल मामला ऐसा था, जैसे मदारी बन्दर को नाना प्रकार के हावभाव सिखाये, ताकि वह दर्शकों को प्रसन्न कर सके। जब वे लोग भोजन करने बैठे तो पिता जी ने यह बताते हुए कि यह पकवान मेरे ही बनाए हुए हैं, मेरी पाक-विद्या की प्रशंसा की; उन्होंने टेबिलक्लाथ की ओर देखा, तो उन्हें बताया गया कि यह मेरी कला है। द्वार की झालरों की ओर उनकी दृष्टि गई, तो उनसे तुरन्त कहा गया कि वह भी मेरी ही कला है। कोने में रखा हुआ सितार ऐसी जगह रख दिया गया, कि जहाँ उनकी दृष्टि उस पर सहज पड़ जाये और उन्हें यह विदित हो जाये, कि मैं गानविद्या में भी निपुण हूँ। ek din kisi vivah ke ichchhuk var ke pita mujhe dekhne aaye. aasha aur nirasha ke beech jhulte, pitaji teen din se ghar ki taiyari kar rahe the. makan ki saphai ki gai, sajavat ki gai, saath hi mujhe bhi sajaya gaya. aise avsar par ghar mein kisi vriddha ka hona avashyak hai, isaliye meri ek door ke rishte ki phuphi ko teen din ke liye is ghar mein basaya gaya. meri pariksha ka din aaya. savere se hi ghar mein baDi halchal mach gai. vriddha phuphi ne mera shringar kiya aur mujhe un logon ke samne kaise chalna chahiye, kaise baat karni chahiye, ye sab sikhaya gaya. kul mamla aisa tha, jaise madari bandar ko nana prkaar ke havbhav sikhaye, taki vah darshkon ko prsann kar sake. jab ve log bhojan karne baithe to pita ji ne ye batate hue ki ye pakvan mere hi banaye hue hain, meri paak vidya ki prshansa kee; unhonne tebilaklath ki or dekha, to unhen bataya gaya ki ye meri kala hai. dvaar ki jhalron ki or unki drishti gai, to unse turant kaha gaya ki vah bhi meri hi kala hai. kone mein rakha hua sitar aisi jagah rakh diya gaya, ki jahan unki drishti us par sahaj paD jaye aur unhen ye vidit ho jaye, ki main ganvidya mein bhi nipun hoon.
Additional Information
Book Type

Hardbound