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Sara Aakash Patkatha

Rs. 450 Rs. 401

1960 के आरम्भिक दिनों में मैंने दो मुख्य फ़िल्में (फ़ीचर फ़िल्म) बनाने में मदद की थी और अपने को एक मुख्य फ़िल्म निर्देशन के योग्य मान रहा था। मैं इधर-उधर एक कहानी तलाश रहा था। मेरे मित्र और सहयोगी अरुण कौल ने राजेन्द्र यादव की कहानी ‘सारा आकाश’ का सुझाव... Read More

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Description

1960 के आरम्भिक दिनों में मैंने दो मुख्य फ़िल्में (फ़ीचर फ़िल्म) बनाने में मदद की थी और अपने को एक मुख्य फ़िल्म निर्देशन के योग्य मान रहा था। मैं इधर-उधर एक कहानी तलाश रहा था। मेरे मित्र और सहयोगी अरुण कौल ने राजेन्द्र यादव की कहानी ‘सारा आकाश’ का सुझाव दिया। उसकी एक प्रति उनके पास थी, उन्होंने मुझे दे दी। एक शाम मैं उसे एक ही साँस में पढ़ गया और मैं अभिभूत ही था।
‘सारा आकाश’ एक जटिल कथा के रूप में लिखा गया था। लेखक ने सपाट रास्ता नहीं चुना था, इसीलिए इसने मुझे ज़्यादा आकर्षित किया था। दृश्यों को मैंने यथासम्भव वर्णन के निकट रखा है। चूँकि लेखक ने कहानी फ़िल्म के लिए नहीं लिखी थी, अत: उसमें बहुत-सी बातों का विवरण दिया गया है जिनको दृश्यों में रूपान्तरित करना एक चुनौती थी।...ऐसे ही कई स्थान हैं जहाँ नायक अतीत और भविष्य के बारे में बहुत कुछ सोच रहा है। छठे दशक के मध्य में मैंने अनेक यूरोपीय और रूसी फ़िल्में देखी थीं। मुझे ऐसे दृश्य लिखने में इनसे सहायता मिली।
पटकथा लिखने के बाद मुझे इसे विक्रम सिंह को दिखाने का अवसर मिला। वे अपने समय में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म आलोचक थे। उन्होंने मेरे प्रयास की सराहना की और मुझे फ़िल्म बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। और ‘सारा आकाश’ बन गई। 1970 में ‘फ़िल्मफ़ेयर’ के समारोह में इसे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पटकथा घोषित किया गया। निर्देशन के लिए इसकी सिफ़ारिश राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भी की गई। इसके कैमरामैन को सर्वश्रेष्ठ छायाचित्रण के लिए पुरस्कार भी मिला।
—बासु चटर्जी 1960 ke aarambhik dinon mein mainne do mukhya filmen (fichar film) banane mein madad ki thi aur apne ko ek mukhya film nirdeshan ke yogya maan raha tha. Main idhar-udhar ek kahani talash raha tha. Mere mitr aur sahyogi arun kaul ne rajendr yadav ki kahani ‘sara aakash’ ka sujhav diya. Uski ek prati unke paas thi, unhonne mujhe de di. Ek sham main use ek hi sans mein padh gaya aur main abhibhut hi tha. ‘sara aakash’ ek jatil katha ke rup mein likha gaya tha. Lekhak ne sapat rasta nahin chuna tha, isiliye isne mujhe zyada aakarshit kiya tha. Drishyon ko mainne yathasambhav varnan ke nikat rakha hai. Chunki lekhak ne kahani film ke liye nahin likhi thi, at: usmen bahut-si baton ka vivran diya gaya hai jinko drishyon mein rupantrit karna ek chunauti thi. . . . Aise hi kai sthan hain jahan nayak atit aur bhavishya ke bare mein bahut kuchh soch raha hai. Chhathe dashak ke madhya mein mainne anek yuropiy aur rusi filmen dekhi thin. Mujhe aise drishya likhne mein inse sahayta mili.
Pataktha likhne ke baad mujhe ise vikram sinh ko dikhane ka avsar mila. Ve apne samay mein ‘taims auf indiya’ ke sarvashreshth film aalochak the. Unhonne mere pryas ki sarahna ki aur mujhe film banane ke liye protsahit kiya. Aur ‘sara aakash’ ban gai. 1970 mein ‘filmfeyar’ ke samaroh mein ise varsh ki sarvashreshth pataktha ghoshit kiya gaya. Nirdeshan ke liye iski sifarish rashtriy puraskar ke liye bhi ki gai. Iske kaimramain ko sarvashreshth chhayachitran ke liye puraskar bhi mila.
—basu chatarji