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Samar Shesh Hai

Abdul Bismillah

Rs. 350 Rs. 312

अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुचर्चित और बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकार हैं। ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के लिए इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका है। ‘समर शेष है’ अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्म-कथात्मक उपन्यास है। कथा-नाटक है, सात-आठ साल का मातृविहीन एक बच्चा, जो कि पिता के साथ-साथ स्वयं भी... Read More

Description

अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुचर्चित और बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकार हैं। ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के लिए इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका है।
‘समर शेष है’ अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्म-कथात्मक उपन्यास है। कथा-नाटक है, सात-आठ साल का मातृविहीन एक बच्चा, जो कि पिता के साथ-साथ स्वयं भी भारी विषमता से ग्रसित है। लेकिन पिता का असामयिक निधन तो उसे जैसे एक विकट जीवन-संग्राम में अकेला छोड़ जाता है। पिता के सहारे उसने जिस सभ्य और सुशिक्षित जीवन के सपने देखे थे, वे उसे एकाएक ढहते हुए दिखाई दिए। फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा और पुरुषार्थ के बल पर अकेले ही अपने दुर्भाग्य से लड़ता रहा। इस दौरान उसे यदि तरह-तरह के अपमान झेलने पड़े तो किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए एक युवती के प्रेम और उसके ह्रदय की समस्त कोमलता का भी अनुभव हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में न तो वह कभी टूटा या पराजित हुआ और न ही अपने लक्ष्य को भूल पाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि विपरीत स्थितियों के बावजूद संकल्प और संघर्ष के गहरे तालमेल से मनुष्य जिस जीवन का निर्माण करता है, यह कृति उसी की सार्थक अभिव्यक्ति है। Abdul bismillah bahucharchit aur bahumukhi pratibha-sampann rachnakar hain. ‘jhini-jhini bini chadariya’ upanyas ke liye inhen ‘soviyat laind nehru puraskar se bhi sammanit kiya ja chuka hai. ‘samar shesh hai’ abdul bismillah ka aatm-kathatmak upanyas hai. Katha-natak hai, sat-ath saal ka matrivihin ek bachcha, jo ki pita ke sath-sath svayan bhi bhari vishamta se grsit hai. Lekin pita ka asamyik nidhan to use jaise ek vikat jivan-sangram mein akela chhod jata hai. Pita ke sahare usne jis sabhya aur sushikshit jivan ke sapne dekhe the, ve use ekayek dhahte hue dikhai diye. Phir bhi usne sahas nahin chhoda aur purusharth ke bal par akele hi apne durbhagya se ladta raha. Is dauran use yadi tarah-tarah ke apman jhelne pade to kishoravastha se yuvavastha ki or badhte hue ek yuvti ke prem aur uske hrday ki samast komalta ka bhi anubhav hua. Lekin is prakriya mein na to vah kabhi tuta ya parajit hua aur na hi apne lakshya ko bhul paya. Kahne ki aavashyakta nahin ki viprit sthitiyon ke bavjud sankalp aur sangharsh ke gahre talmel se manushya jis jivan ka nirman karta hai, ye kriti usi ki sarthak abhivyakti hai.