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Sahar Ke Khwab

Monika Singh

Rs. 300 Rs. 267

प्रेम की गहरी व्यंजना, नज़दीकियों और दूरियों की हस्सास अक्कासी, देश और समाज की तल्ख़ हक़ीक़तों से ज़ख़्मी मिसरों और शे’रों की गहरी बुनावट—इन सबसे मिलकर बनती हैं मो‌निका सिंह की ग़ज़लें और इस नए ग़ज़ल-संग्रह के ख़्वाब। कहते हैं सहर यानी सुबह के वक़्त देखे गए ख़्वाब सच हो... Read More

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Description

प्रेम की गहरी व्यंजना, नज़दीकियों और दूरियों की हस्सास अक्कासी, देश और समाज की तल्ख़ हक़ीक़तों से ज़ख़्मी मिसरों और शे’रों की गहरी बुनावट—इन सबसे मिलकर बनती हैं मो‌निका सिंह की ग़ज़लें और इस नए ग़ज़ल-संग्रह के ख़्वाब।
कहते हैं सहर यानी सुबह के वक़्त देखे गए ख़्वाब सच हो जाते हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों में ऐसे अनेक ख़्वाब सँजोए गए हैं, जिन्हें सच होना ही चाहिए। ख़ुशियों के, प्यार के, मिलन के, समाजी एकता और क़ौमी मुहब्बत के ख़्वाब के साथ मोनिका सिंह अपने वक़्त को भी बहुत गहराई से देखती है; और अपने मन को भी। यही वजह है कि उनके अहसास का सन्तुलन कहीं भी गड़बड़ाता नहीं है।
‘यकायक नींद में आँसू निकल आए; वो ख़्वाबों में मुझे तड़पा गया शायद।’ एक ग़ज़ल का यह शे’र जहाँ इश्क़ की गहरी संवेदना को रौशन करता है, वहीं हमें ऐसे शे’र भी पढ़ने को मिलते हैं: ‘दूरियाँ दो मज़हबों में की जिन्होंने, कह रहे वो/फ़ासले होते नहीं कम, बात इतनी सी नहीं है/ फेंककर स्याही बने हैं देशभक्ति के पुजारी/बँट गए मुद्दों में यूँ हम, बात इतनी सी नहीं है।’
देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली ग़ज़लों ने धीरे-धीरे उर्दू अल्फ़ाज़ से अपनी नज़दीकी बढ़ाई है, आमफ़हम होने के नाम पर सपाट होने की आशंका को उसने काफ़ी कम किया है, और उर्दू ग़ज़ल की बहुस्तरीय अर्थगर्भिता के नज़दीक गई है। यह बात इस संग्रह में भी देखने को मिलती है। Prem ki gahri vyanjna, nazdikiyon aur duriyon ki hassas akkasi, desh aur samaj ki talkh haqiqton se zakhmi misron aur she’ron ki gahri bunavat—in sabse milkar banti hain mo‌nika sinh ki gazlen aur is ne gazal-sangrah ke khvab. Kahte hain sahar yani subah ke vaqt dekhe ge khvab sach ho jate hain. Is sangrah ki gazlon mein aise anek khvab sanjoe ge hain, jinhen sach hona hi chahiye. Khushiyon ke, pyar ke, milan ke, samaji ekta aur qaumi muhabbat ke khvab ke saath monika sinh apne vaqt ko bhi bahut gahrai se dekhti hai; aur apne man ko bhi. Yahi vajah hai ki unke ahsas ka santulan kahin bhi gadabdata nahin hai.
‘yakayak nind mein aansu nikal aae; vo khvabon mein mujhe tadpa gaya shayad. ’ ek gazal ka ye she’ra jahan ishq ki gahri sanvedna ko raushan karta hai, vahin hamein aise she’ra bhi padhne ko milte hain: ‘duriyan do mazahbon mein ki jinhonne, kah rahe vo/fasle hote nahin kam, baat itni si nahin hai/ phenkkar syahi bane hain deshbhakti ke pujari/bant ge muddon mein yun hum, baat itni si nahin hai. ’
Devnagri lipi mein likhi janevali gazlon ne dhire-dhire urdu alfaz se apni nazdiki badhai hai, aamafham hone ke naam par sapat hone ki aashanka ko usne kafi kam kiya hai, aur urdu gazal ki bahustriy arthgarbhita ke nazdik gai hai. Ye baat is sangrah mein bhi dekhne ko milti hai.

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