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Safar Ek Dongi Main Dagmag

Rakesh Tiwari

Rs. 450 Rs. 401

‘सफ़र एक डोंगी में डगमग' यात्रा-वृत्तान्त के तौर पर जितनी रोमांचक है उतना ही मज़बूत इसका ऐतिहासिक और भौगोलिक पक्ष भी है। डगमग डोंगी के साथ चलते हुए लेखक घाट-घाट के ऐतिहासिक महत्त्व के पर्दों को हमारे सामने इस तरह खोलता जाता है, जैसे कोई पुरातत्त्वविद् खुदाई कर इतिहास को... Read More

Description

‘सफ़र एक डोंगी में डगमग' यात्रा-वृत्तान्त के तौर पर जितनी रोमांचक है उतना ही मज़बूत इसका ऐतिहासिक और भौगोलिक पक्ष भी है।
डगमग डोंगी के साथ चलते हुए लेखक घाट-घाट के ऐतिहासिक महत्त्व के पर्दों को हमारे सामने इस तरह खोलता जाता है, जैसे कोई पुरातत्त्वविद् खुदाई कर इतिहास को हमारे सामने ला खड़ा कर देता है। यह पुस्तक उत्तर-पूर्वी भारत की बदलती भौगोलिक संरचना, संस्कृति और बोलियों को समझने में एक विशिष्ट दस्तावेज़ की तरह भी काम करती है।
दिल्ली की ‘ओखला हेड' जैसी छोटी नहर से यात्रा शुरू कर जल्द ही यमुना में हिलोरें मारती डोंगी मथुरा, आगरा, इलाहाबाद, बनारस, कानपुर और पटना होती हुई अन्ततः कोलकाता की हुगली नदी में जाकर रुकती है। लेखक को यह यात्रा पूरी करने में जहाँ बासठ दिन लगते हैं, वहीं किताब लिखने में तीस साल।
लेखक के साथ डोंगी भी अपना इतिहास लिखती हुई चलती है। इसमें नदियाँ जीते-जागते किरदारों की तरह हैं, जो कूद-कूदकर पंक्तिबद्ध आती हैं, अठखेलियाँ करती हैं और अपना नाम दर्ज कराती हुई खो जाती हैं।
'सफ़र एक डोंगी में डगमग' रोमांच, बेचैनी, उकताहट, संघर्ष, जिजीविषा, दोस्ती और ढेरों किस्सों में बँधी किताब है जो आख़िरी पन्नों तक पाठकों को बाँधे रहती है। ‘safar ek dongi mein dagmag yatra-vrittant ke taur par jitni romanchak hai utna hi mazbut iska aitihasik aur bhaugolik paksh bhi hai. Dagmag dongi ke saath chalte hue lekhak ghat-ghat ke aitihasik mahattv ke pardon ko hamare samne is tarah kholta jata hai, jaise koi puratattvvid khudai kar itihas ko hamare samne la khada kar deta hai. Ye pustak uttar-purvi bharat ki badalti bhaugolik sanrachna, sanskriti aur boliyon ko samajhne mein ek vishisht dastavez ki tarah bhi kaam karti hai.
Dilli ki ‘okhla hed jaisi chhoti nahar se yatra shuru kar jald hi yamuna mein hiloren marti dongi mathura, aagra, ilahabad, banaras, kanpur aur patna hoti hui antatः kolkata ki hugli nadi mein jakar rukti hai. Lekhak ko ye yatra puri karne mein jahan basath din lagte hain, vahin kitab likhne mein tis saal.
Lekhak ke saath dongi bhi apna itihas likhti hui chalti hai. Ismen nadiyan jite-jagte kirdaron ki tarah hain, jo kud-kudkar panktibaddh aati hain, athkheliyan karti hain aur apna naam darj karati hui kho jati hain.
Safar ek dongi mein dagmag romanch, bechaini, uktahat, sangharsh, jijivisha, dosti aur dheron kisson mein bandhi kitab hai jo aakhiri pannon tak pathkon ko bandhe rahti hai.