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Safai Kamgar Samuday

Sanjeev Khudshah

Rs. 125 Rs. 111

सिर पर मैला ढोने की प्रथा मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक रही है। सोचनेवाले सदा से सोचते रहे हैं कि आख़िर ये कैसे हुआ कि कुछ लोगों ने अपने ही जैसे मनुष्यों की गन्दगी को ढोना अपना पेशा बना लिया। इस पुस्तक का प्रस्थान बिन्दु भी... Read More

Description

सिर पर मैला ढोने की प्रथा मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक रही है। सोचनेवाले सदा से सोचते रहे हैं कि आख़िर ये कैसे हुआ कि कुछ लोगों ने अपने ही जैसे मनुष्यों की गन्दगी को ढोना अपना पेशा बना लिया। इस पुस्तक का प्रस्थान बिन्दु भी यही सवाल है। लेखक संजीव खुदशाह ने इसी सवाल का जवाब हासिल करने के लिए व्यापक अध्ययन किया, विभिन्न वर्गों के लोगों, विचारकों और बुद्धिजीवियों से विचार-विमर्श किया। उनका मानना है कि इस पेशे में काम करनेवाले लोग यहाँ की ऊँची जातियों से ही, ख़ासकर क्षत्रिय एवं ब्राह्मण जातियों से निकले। इसी तरह किसी समय श्रेष्ठ समझी जानेवाली डोम वर्ग की जातियाँ भी इस पेशे में आईं। लेखक ने इन पृष्ठों में सफ़ाई कामगार समुदायों के बीच रहकर अर्जित किए गए अनुभवों का विवरण भी दिया है। Sir par maila dhone ki prtha manav sabhyta ki sabse badi vidambnaon mein se ek rahi hai. Sochnevale sada se sochte rahe hain ki aakhir ye kaise hua ki kuchh logon ne apne hi jaise manushyon ki gandgi ko dhona apna pesha bana liya. Is pustak ka prasthan bindu bhi yahi saval hai. Lekhak sanjiv khudshah ne isi saval ka javab hasil karne ke liye vyapak adhyyan kiya, vibhinn vargon ke logon, vicharkon aur buddhijiviyon se vichar-vimarsh kiya. Unka manna hai ki is peshe mein kaam karnevale log yahan ki uunchi jatiyon se hi, khaskar kshatriy evan brahman jatiyon se nikle. Isi tarah kisi samay shreshth samjhi janevali dom varg ki jatiyan bhi is peshe mein aain. Lekhak ne in prishthon mein safai kamgar samudayon ke bich rahkar arjit kiye ge anubhvon ka vivran bhi diya hai.