BackBack
-11%

Saat Aasmaan

Asghar Wajahat

Rs. 250 Rs. 223

यह उपन्यास लम्बे कालखंड, लगभग चार सौ साल के दौरान एक परिवार की कहानी है। इसमें मौखिक परम्परा, कहीं-कहीं वातावरण बनाने के लिए इतिहास और कहीं निजी अनुभवों का सम्मिश्रण है। एक तरह से यह लम्बा बयान है जो पात्र स्वयं देते हैं। लेखक भी एक द्रष्टा है। पात्र न... Read More

BlackBlack
Description

यह उपन्यास लम्बे कालखंड, लगभग चार सौ साल के दौरान एक परिवार की कहानी है। इसमें मौखिक परम्परा, कहीं-कहीं वातावरण बनाने के लिए इतिहास और कहीं निजी अनुभवों का सम्मिश्रण है। एक तरह से यह लम्बा बयान है जो पात्र स्वयं देते हैं। लेखक भी एक द्रष्टा है। पात्र न तो उसके बनाए हुए हैं और न उसके वश में हैं। अपनी गति और स्थितियों के अनुसार वे जो अनुभव करते हैं, जैसा व्यवहार करते हैं, वह उपन्यास में उन्ही की जुबानी आया है। एक तरह से इस उपन्यास को शास्त्रीय परिभाषा के अन्तर्गत भी नहीं रखा जा सकता क्योंकि इसमें वह एकसूत्रता नहीं है जो प्रायः उपन्यासों में होती है। यदि इसका कोई सूत्र है तो वह जीवन है जो लगातार बदल रहा है और नए-नए साँचों में ढल रहा है।
लम्बे विवरण और संवाद या पात्रों की सोच उन्हें उधेड़ती चली जाती है। अच्छा क्या है? बुरा क्या है? जीवन जीने का सही तरीक़ा क्या है? जीवन क्या है? वे लोग कैसे थे जिनकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती? —आदि सवालों के जवाब उपन्यास नहीं देता, न उन पर कोई ‘वैल्यू जजमेंट’ देता है। वह केवल पात्रों और परिस्थितियों को उद्घाटित करने में ही व्यस्त है।
‘सात आसमान’ भारत के सामन्ती समाज के कई युगों को उद्घाटित करता है। इसके साथ-साथ हर युग के मनुष्य और उसके सरोकारों को समझना ही उपन्यास का विषय है। न तो इसमें किसी को गौरवान्वित किया गया है और न किसी को निन्दनीय माना गया है। कहीं मानवीय सम्बन्ध बहुत सशक्त और गहरे दिखाई देते हैं तो कहीं पतनशीलता की चरम सीमा तक पहुँच गए हैं।
उपन्यास में अतीत के प्रति कोई मोह नहीं है। यह अतीत को वर्तमान के सन्दर्भ में या एक लम्बी यात्रा के पिछड़े पड़ावों को समझने के रूप में ही लेता है। उपन्यास में ‘नास्टैल्जिया’ भी नहीं है। हो सकता है कि पात्रों के अन्दर जाने की कोशिश यह दिखाए कि लेखक पात्रों की परतें उघाड़ते हुए निर्मम ज़रूर हो गया है, लेकिन वह सब जो कुछ हुआ है इसे न तो लेखक बदल सकता था और न बदलना चाहता ही था।
किसी प्रकार की वैचारिकता या बौद्धिकता या दार्शनिकता या प्रतिबद्धता को आरोपित न करते हुए भी यह उपन्यास निश्चय ही दृष्टिसम्पन्न उपन्यास है क्योंकि यह यथार्थ को उसकी पूरी समग्रता और गतिशीलता में पकड़ता है। चाहें तो इसके माध्यम से सामाजिक रिश्तों, राजनीतिक हलचलों और सांस्कृतिक विकास के बिन्दुओं को रेखांकित किया जा सकता है। पर यह सब पाठकों या आलोचकों पर निर्भर है। यानी यह ‘इंटरप्रेटेशन’ के खुला हुआ है। Ye upanyas lambe kalkhand, lagbhag char sau saal ke dauran ek parivar ki kahani hai. Ismen maukhik parampra, kahin-kahin vatavran banane ke liye itihas aur kahin niji anubhvon ka sammishran hai. Ek tarah se ye lamba bayan hai jo patr svayan dete hain. Lekhak bhi ek drashta hai. Patr na to uske banaye hue hain aur na uske vash mein hain. Apni gati aur sthitiyon ke anusar ve jo anubhav karte hain, jaisa vyavhar karte hain, vah upanyas mein unhi ki jubani aaya hai. Ek tarah se is upanyas ko shastriy paribhasha ke antargat bhi nahin rakha ja sakta kyonki ismen vah eksutrta nahin hai jo prayः upanyason mein hoti hai. Yadi iska koi sutr hai to vah jivan hai jo lagatar badal raha hai aur ne-ne sanchon mein dhal raha hai. Lambe vivran aur sanvad ya patron ki soch unhen udhedti chali jati hai. Achchha kya hai? bura kya hai? jivan jine ka sahi tariqa kya hai? jivan kya hai? ve log kaise the jinki aaj kalpna bhi nahin ki ja sakti? —adi savalon ke javab upanyas nahin deta, na un par koi ‘vailyu jajment’ deta hai. Vah keval patron aur paristhitiyon ko udghatit karne mein hi vyast hai.
‘sat aasman’ bharat ke samanti samaj ke kai yugon ko udghatit karta hai. Iske sath-sath har yug ke manushya aur uske sarokaron ko samajhna hi upanyas ka vishay hai. Na to ismen kisi ko gaurvanvit kiya gaya hai aur na kisi ko nindniy mana gaya hai. Kahin manviy sambandh bahut sashakt aur gahre dikhai dete hain to kahin patanshilta ki charam sima tak pahunch ge hain.
Upanyas mein atit ke prati koi moh nahin hai. Ye atit ko vartman ke sandarbh mein ya ek lambi yatra ke pichhde padavon ko samajhne ke rup mein hi leta hai. Upanyas mein ‘nastailjiya’ bhi nahin hai. Ho sakta hai ki patron ke andar jane ki koshish ye dikhaye ki lekhak patron ki parten ughadte hue nirmam zarur ho gaya hai, lekin vah sab jo kuchh hua hai ise na to lekhak badal sakta tha aur na badalna chahta hi tha.
Kisi prkar ki vaicharikta ya bauddhikta ya darshanikta ya pratibaddhta ko aaropit na karte hue bhi ye upanyas nishchay hi drishtisampann upanyas hai kyonki ye yatharth ko uski puri samagrta aur gatishilta mein pakadta hai. Chahen to iske madhyam se samajik rishton, rajnitik halachlon aur sanskritik vikas ke binduon ko rekhankit kiya ja sakta hai. Par ye sab pathkon ya aalochkon par nirbhar hai. Yani ye ‘intrapreteshan’ ke khula hua hai.