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Saare Sukhan Humare

Rs. 450 Rs. 401

Rajkamal Prakashan

‘सारे स़ुखन हमारे’ के रूप में समकालीन उर्दू शाइरी के अजीमुश्शान शाइर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआ’त को हिन्दी में पहली बार एक साथ प्रस्तुत किया गया है। इसमें उनका आख़िरी कलाम तक शामिल है। उर्दू शाइरी में फ़ैज़ को ग़ालिब और इक़बाल के पाये... Read More

Description

‘सारे स़ुखन हमारे’ के रूप में समकालीन उर्दू शाइरी के अजीमुश्शान शाइर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआ’त को हिन्दी में पहली बार एक साथ प्रस्तुत किया गया है। इसमें उनका आख़िरी कलाम तक शामिल है।
उर्दू शाइरी में फ़ैज़ को ग़ालिब और इक़बाल के पाये का शाइर माना गया है, लेकिन उनकी प्रतिबद्ध प्रगतिशील जीवन-दृष्टि सम्पूर्ण उर्दू शाइरी में उन्हें एक नई बुलन्दी सौंप जाती है। फूलों की रंगो-बू से सराबोर शाइरी से अगर आँच भी आ रही हो तो मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहाँ पूरी तरह मौजूद हैं। यही उनकी शाइरी की ख़ास पहचान है, यानी रोमानी तेवर में ख़ालिस इन्क़लाबी बात। उनकी तमाम रचनाओं में जैसे एक अर्थपूर्ण उदासी, दर्द और कराह छुपी हुई है, इसके बावजूद वह हमें अद्भुत रूप से अपनी पस्तहिम्मती के ख़िलाफ़ खड़ा करने में समर्थ हैं। कारण, रचनात्मकता के साथ चलनेवाले उनके जीवन-संघर्ष। उन्हीं में उनकी शाइरी का जन्म हुआ और उन्हीं के चलते वह पली-बढ़ी। वे उसे अपने लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ तक ले गए और कुछ इस अन्दाज़ में कि वह दुनिया के तमाम मजलूमों की आवाज़ बन गई।
वस्तुत: फ़ैज़ की शाइरी हमारे समय की गहन मानवी, समाजी और सियासी सच्चाइयों का पर्याय है। वह हर पल असलियत के साथ है और भाषाई दीवारों को लाँघकर बोलती है। कहना न होगा कि उर्दू के इस महान शाइर की सम्पूर्ण कविताओं का यह एकज़िल्द मज्मूआ
हिन्दी में चाव के साथ पढ़ा और सहेजा जाएगा। ‘sare sukhan hamare’ ke rup mein samkalin urdu shairi ke ajimushshan shair faiz ahmad faiz ki tamam gazlon, najmon, giton aur qata’ta ko hindi mein pahli baar ek saath prastut kiya gaya hai. Ismen unka aakhiri kalam tak shamil hai. Urdu shairi mein faiz ko galib aur iqbal ke paye ka shair mana gaya hai, lekin unki pratibaddh pragatishil jivan-drishti sampurn urdu shairi mein unhen ek nai bulandi saump jati hai. Phulon ki rango-bu se sarabor shairi se agar aanch bhi aa rahi ho to maan lena chahiye ki faiz vahan puri tarah maujud hain. Yahi unki shairi ki khas pahchan hai, yani romani tevar mein khalis inqlabi baat. Unki tamam rachnaon mein jaise ek arthpurn udasi, dard aur karah chhupi hui hai, iske bavjud vah hamein adbhut rup se apni pasthimmti ke khilaf khada karne mein samarth hain. Karan, rachnatmakta ke saath chalnevale unke jivan-sangharsh. Unhin mein unki shairi ka janm hua aur unhin ke chalte vah pali-badhi. Ve use apne lahu ki aag mein tapakar avam ke dilo-dimag tak le ge aur kuchh is andaz mein ki vah duniya ke tamam majlumon ki aavaz ban gai.
Vastut: faiz ki shairi hamare samay ki gahan manvi, samaji aur siyasi sachchaiyon ka paryay hai. Vah har pal asaliyat ke saath hai aur bhashai divaron ko langhakar bolti hai. Kahna na hoga ki urdu ke is mahan shair ki sampurn kavitaon ka ye ekzild majmua
Hindi mein chav ke saath padha aur saheja jayega.