BackBack
-11%

Raston Par Bhatakte Huye

Rs. 200 Rs. 178

जिस वक़्त गाँवों का महानगरों में, पत्रकारिता का राजनीति में और राजनीति का उद्योग-उपक्रमों में विलय हो रहा हो; रास्तों पर भटकते हुए कार्य-कारण; सही-ग़लत की खोज करना तो दुनियादारी नहीं। मगर उपन्यास की नायिका मंजरी यही करती है। उसमें एक छटपटाहट है जानने की, कि जो होता रहा है... Read More

Description

जिस वक़्त गाँवों का महानगरों में, पत्रकारिता का राजनीति में और राजनीति का उद्योग-उपक्रमों में विलय हो रहा हो; रास्तों पर भटकते हुए कार्य-कारण; सही-ग़लत की खोज करना तो दुनियादारी नहीं। मगर उपन्यास की नायिका मंजरी यही करती है। उसमें एक छटपटाहट है जानने की, कि जो होता रहा है वह क्यों होता रहा है ? इस दौरान वह बार-बार लहूलुहान होती है। घर-परिवार सहकर्मी सबसे विच्छिन्न होकर भाषा की, शब्दों की आदिम खोह में छिपने की कोशिश करती है, कुछ हद तक सफल भी होती है। पर तभी बंटी उसके जीवन में प्रवेश करता है, और उसके भीतर का हिमवारिधि पिघलने लगता है। किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की रहस्यमयी रखैल का यह मासूम-गर्वीला बच्चा, उँगली पकड़कर मंजरी को अपने साथ उन रास्तों पर भटकाता है, जहाँ पैर रखने से वह कतराती रही है। पहले बंटी, और उसके बाद उसकी माँ की नृशंस हत्या, और राजधानी के सुरक्षातंत्र की रहस्यमय चुप्पी मंजरी को इन हत्यारों की तह में जाने को बाध्य करती है। बंटी की स्मृति के सहारे तब मंजरी एक स्याह पाताली गंगा के दर्शन करती है, जो देश के मर्म, उसकी राजधानी के तलघर में कई रहस्यमय भेदों को छुपाए बह रही है। चाहे न चाहे मंजरी के अपने जीवन के कई स्रोत भी इससे जुड़े हुए निकलते हैं। दो मौतों की तफ़्तीश के बहाने मंजरी अपने निजी जीवन, विवेक एवं अपनी अन्तरात्मा की परिक्रमा करते हुए रास्तों पर भटकती है। Jis vaqt ganvon ka mahanagron mein, patrkarita ka rajniti mein aur rajniti ka udyog-upakrmon mein vilay ho raha ho; raston par bhatakte hue karya-karan; sahi-galat ki khoj karna to duniyadari nahin. Magar upanyas ki nayika manjri yahi karti hai. Usmen ek chhataptahat hai janne ki, ki jo hota raha hai vah kyon hota raha hai ? is dauran vah bar-bar lahuluhan hoti hai. Ghar-parivar sahkarmi sabse vichchhinn hokar bhasha ki, shabdon ki aadim khoh mein chhipne ki koshish karti hai, kuchh had tak saphal bhi hoti hai. Par tabhi banti uske jivan mein prvesh karta hai, aur uske bhitar ka himvaridhi pighalne lagta hai. Kisi mahattvpurn vyakti ki rahasyamyi rakhail ka ye masum-garvila bachcha, ungali pakadkar manjri ko apne saath un raston par bhatkata hai, jahan pair rakhne se vah katrati rahi hai. Pahle banti, aur uske baad uski man ki nrishans hatya, aur rajdhani ke surakshatantr ki rahasymay chuppi manjri ko in hatyaron ki tah mein jane ko badhya karti hai. Banti ki smriti ke sahare tab manjri ek syah patali ganga ke darshan karti hai, jo desh ke marm, uski rajdhani ke talghar mein kai rahasymay bhedon ko chhupaye bah rahi hai. Chahe na chahe manjri ke apne jivan ke kai srot bhi isse jude hue nikalte hain. Do mauton ki taftish ke bahane manjri apne niji jivan, vivek evan apni antratma ki parikrma karte hue raston par bhatakti hai.