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Raat-Din Jagayen Aakash Gangayen

Rajwanti Mann

Rs. 395.00

इन कविताओं के शब्दार्थ भी बिम्ब, रूपक, प्रतीक से आगे उत्तीर्ण होकर साहचर्य (एसोसिएशन) के क्षेत्र में आ जाते हैं। इतस्ततः इसलिए अपनी साधारणता तथा धारावाहिकता का उल्लंघन करते हुए चमत्कार और विद्रूपता की प्रोक्ति का संदर्श कराते हैं।इसलिए शब्द तथा साहचर्य की इस मौलिकता के अधिग्रहण को रेखांकित किया... Read More

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Description
इन कविताओं के शब्दार्थ भी बिम्ब, रूपक, प्रतीक से आगे उत्तीर्ण होकर साहचर्य (एसोसिएशन) के क्षेत्र में आ जाते हैं। इतस्ततः इसलिए अपनी साधारणता तथा धारावाहिकता का उल्लंघन करते हुए चमत्कार और विद्रूपता की प्रोक्ति का संदर्श कराते हैं।इसलिए शब्द तथा साहचर्य की इस मौलिकता के अधिग्रहण को रेखांकित किया जाना चाहिए। इससे कई अज्ञात तथा अजनबी लक्ष्यों की खोज मिलती है। इसलिए कविताओं में किंचित मामूली (रस्टिक) संज्ञान में जो जटिलता तथा देहाती अनगढ़ता है वह देश, समाज, काल, इतिहास की जड़ों की वर्तमान खोज तथा उनकी सही पहचान कराती है। वह सतह के ग्रामपन और शहरीपन को अक्खड़ अधिभाषा के द्वारा विलक्षण एवं असाधारण भी बनाती है; लेकिन सहज सम्प्रेषण (कम्युनिकेशन) चालू रखती है।'अतएव हमारा विश्वास पुष्ट करती है कि सुबह एक बार, कई बार, बार-बार होती रहेगी।‘इसको स्वीकार करके हम इस संग्रह के विप्लवीकरण तथा लोक शहरी आधुनिक जड़ों को पहचानने और आत्मसात करने की मनोदशा बनाने बढ़ते हैं....