About the Book:
समर्पण के इन शब्दों के साथ ही इस रिवायत से फ़ारिग हुआ जा सकता है। लेकिन इस अनुष्ठान में थोड़ी सी संवेदना का संचार तो होना ही चाहिए, क्योंकि वो नज़्म ही क्या जिसमें नुक्ते न हों, वो श्लोक ही क्या जिसमें हलन्त लगे शब्द नहीं। तो इस किताब को उन शिक्षिकाओं-शिक्षकों को समर्पित करना चाहिए जो संघर्षशील हैं।
About the Author:देवनाथ पाठक साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं और दक्षिण एशिया के सामाजिक व सांस्कृतिक पहलुओं पर शोध एवं लेखन करते हैं। उनकी अनेक प्रकाशित पुस्तकों में कुछ महत्वपूर्ण शीर्षक हैं, इन डिफेंस ऑफ़ दि ऑर्डिनरी : एवरीडे अवेकेनिंग्स, लिविंग एण्ड डाइंग : मीनिंग्स इन मैथिली फ़ोकलोर आदि। इन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया है, यथा : अनदर साउथ एशिया, कल्चर एण्ड 4 पॉलिटिक्स इन साउथ एशिया : परफ़ॉर्मेटिव कम्युनिकेशन आदि। ये दो अकादमिक जर्नलों का सम्पादन भी करते हैं और यूट्यूब पर प्रचलित अकादमिक और सांस्कृतिक समूह, गल्प लोक के वरिष्ठ समायोजक भी हैं।