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Punarutthan

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आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध... Read More

Description

आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था।
‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है।
‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है। Aadhunik itihas mein yadi kisi vicharak-lekhak ki khyati uski zindagi mein hi puri duniya mein phail chuki thi aur jite-ji hi vah ek mithak ban gaya tha, to ve lev tolstoy hi the. Unnisvin shatabdi ke purvarddh ke sahityik paridrishya par jis tarah balzak chhaye hue the, usi tarah uttrarddh ke sahityik paridrishya par tolstoy ka prbhav-samrajya phaila hua tha. ‘punrutthan’ ek ne prkar ka upanyas tha jismen patron ke gahan aatmsangharsh aur rupantran ke saath hi, sent pitarsbarg ke darbar ke logon aur gramin kulinon se lekar kisanon, qaidiyon aur saiberiya-nirvasan par ja rahe qaidiyon ke charitron ke madhyam se tatkalin rus ke samuche vaividhypurn samajik paridrishya ko ek itihaskar-sadrish vastuparakta aur adhikar ke saath upasthit kar diya gaya hai. Katyusha ka muqadma aur usmen juri sadasya ke rup mein nekhludov ki upasthiti samajik anyay par aadharit jivan ki nirarthakta aur nyaytantr ki kurupta ko ekdam nanga kar deti hai.
‘punrutthan’ mein tolstoy sarkar, nyayalay, charch, kulin bhusvamiyon ke visheshadhikariyon, bhumi ke niji svamitv, mudra, jelon aur veshyavritti ki marmbhedi aalochna karte hain. Ghani aur shaktishali logon dvara utpidit nimn vargon ke prati sahanubhuti-prdarshan par upanyas tikha vyangya karta hai. Kisanon, krantikariyon aur nirvasit apradhiyon sahit samanya janasamuday ka chitran karte hue tolstoy ka zor is baat par hai ki utpidan aur adhikarhinta ne aamjan ki aatmik shaktiyon ko pangu bana dala hai.