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Prem Lahari

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प्रेमलहरी' इतिहास के बड़े चौखटे में कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से बुनी हुई प्रेमकथा है। यह इतिहास नहीं है, न ही इसका वर्णन किसी इतिहास पुस्तक में मिलता है। लेकिन जनश्रुति में इस कथा के अलग-अलग हिस्से या अलग-अलग संस्करण अकसर सुने जाते हैं। इस प्रेम-आख्यान के नायक-नायिका हैं... Read More

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Description

प्रेमलहरी' इतिहास के बड़े चौखटे में कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से बुनी हुई प्रेमकथा है। यह इतिहास नहीं है, न ही इसका वर्णन किसी इतिहास पुस्तक में मिलता है। लेकिन जनश्रुति में इस कथा के अलग-अलग हिस्से या अलग-अलग संस्करण अकसर सुने जाते हैं। इस प्रेम-आख्यान के नायक-नायिका हैं शाहजहाँ के राजकवि और दारा शिकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ और मुग़ल शाहज़ादी गौहरआरा उर्फ़ लवंगी।
मध्यकालीन इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम-आख्यान तो कई मिलते हैं, लेकिन किसी शाहज़ादी की किसी ब्राह्मण आचार्य और कवि से यह अकेली प्रेम कहानी है जो मुग़ल दरबार की दुरभिसन्धियों के बीच आकार लेती है। 'गंगालहरी' ख़ुद पंडितराज जगन्नाथ का अद्भुत संस्कृत काव्य है जिसमें कहीं-कहीं ख़ुद उनके प्रेम की व्यंजना निहित है।
प्रचलित बतकहियों की गप्प समाजविज्ञान से मिल जाए तो उससे एक बड़ा सच भी सामने आ जाता है। इस उपन्यास में यह हुआ है। मुग़ल शाहज़ादियों को न शादी की इजाज़त थी न प्रेम करने की। ऐसे में चोरी-छुपे प्रेम-सुख तलाश करना उनकी मजबूरी रही होगी। इस उपन्यास में ऐसे कुछ विवरण आए हैं।
यह उपन्यास इतिहास की एक फ़ैंटेसी है, जिसमें किंवदन्तियों के आधार पर मध्यकालीन सत्ता-संरचना के बीच दो धर्मों और दो वर्गों के बीच न पाटी जा सकनेवाली ख़ाली जगह में प्रेम का फूल खिलते दिखाया गया है। Premalahri itihas ke bade chaukhte mein kalpna aur janashrutiyon ke dhagon se buni hui premaktha hai. Ye itihas nahin hai, na hi iska varnan kisi itihas pustak mein milta hai. Lekin janashruti mein is katha ke alag-alag hisse ya alag-alag sanskran aksar sune jate hain. Is prem-akhyan ke nayak-nayika hain shahajhan ke rajakavi aur dara shikoh ke guru panditraj jagannath aur mugal shahzadi gauharara urf lavangi. Madhykalin itihas mein hindu-muslim prem-akhyan to kai milte hain, lekin kisi shahzadi ki kisi brahman aacharya aur kavi se ye akeli prem kahani hai jo mugal darbar ki durabhisandhiyon ke bich aakar leti hai. Gangalahri khud panditraj jagannath ka adbhut sanskrit kavya hai jismen kahin-kahin khud unke prem ki vyanjna nihit hai.
Prachlit batakahiyon ki gapp samajvigyan se mil jaye to usse ek bada sach bhi samne aa jata hai. Is upanyas mein ye hua hai. Mugal shahzadiyon ko na shadi ki ijazat thi na prem karne ki. Aise mein chori-chhupe prem-sukh talash karna unki majburi rahi hogi. Is upanyas mein aise kuchh vivran aae hain.
Ye upanyas itihas ki ek faintesi hai, jismen kinvdantiyon ke aadhar par madhykalin satta-sanrachna ke bich do dharmon aur do vargon ke bich na pati ja saknevali khali jagah mein prem ka phul khilte dikhaya gaya hai.