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Pratinidhi Vyang : Harishankar Parsai

Harishankar Parsai

Rs. 99

हरिशंकर परसाई हिन्दी के पहले रचनाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के-फुल्के मनोरंजन की परम्परागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी पैदा नहीं करतीं, बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने खड़ा करती हैं,... Read More

Description

हरिशंकर परसाई हिन्दी के पहले रचनाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के-फुल्के मनोरंजन की परम्परागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी पैदा नहीं करतीं, बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने खड़ा करती हैं, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असम्भव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन-मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान-सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा-शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सिर पर नहीं, सामने ही बैठा है। Harishankar parsai hindi ke pahle rachnakar hain, jinhonne vyangya ko vidha ka darja dilaya aur use halke-phulke manoranjan ki parampragat paridhi se ubarkar samaj ke vyapak prashnon se joda hai. Unki vyangya rachnayen hamare man mein gudagudi paida nahin kartin, balki hamein un samajik vastaviktaon ke aamne-samne khada karti hain, jinse kisi bhi vyakti ka alag rah pana lagbhag asambhav hai. Lagatar khokhli hoti ja rahi hamari samajik aur rajnitik vyvastha mein piste madhyvargiy man ki sachchaiyon ko unhonne bahut hi nikatta se pakda hai. Samajik pakhand aur rudhivadi jivan-mulyon ki khilli udate hue unhonne sadaiv vivek aur vigyan-sammat drishti ko sakaratmak rup mein prastut kiya hai. Unki bhasha-shaili mein khas kism ka apnapa hai, jisse pathak ye mahsus karta hai ki lekhak uske sir par nahin, samne hi baitha hai.