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Pratinidhi Kavitayen : Srikant Verma

Rs. 75

श्रीकान्त वर्मा का कविता-संसार उनके पाँच कविता-संग्रहों—‘भटका मेघ’ (1957), ‘दिनारम्भ’ (1967), ‘माया दर्पण’ (1967), ‘जलसाघर’ (1973) और ‘मगध’ (1984) में फैला हुआ है। यहाँ इन्हीं से इन कविताओं का चयन किया गया है। इन कविताओं से गुजरते हुए लगेगा कि कवि में आद्यन्त अपने परिवेश और उसे झेलते मनुष्य के... Read More

Description

श्रीकान्त वर्मा का कविता-संसार उनके पाँच कविता-संग्रहों—‘भटका मेघ’ (1957), ‘दिनारम्भ’ (1967), ‘माया दर्पण’ (1967), ‘जलसाघर’ (1973) और ‘मगध’ (1984) में फैला हुआ है। यहाँ इन्हीं से इन कविताओं का चयन किया गया है। इन कविताओं से गुजरते हुए लगेगा कि कवि में आद्यन्त अपने परिवेश और उसे झेलते मनुष्य के प्रति गहरा लगाव है। उसके आत्मगौरव और भविष्य को लेकर वह लगातार चिन्तित है। उसमें यदि परम्परा का स्वीकार है तो उसे तोड़ने और बदलने की बेचैनी भी कम नहीं है। शुरू में उसकी कविताएँ अपनी ज़मीन और ग्राम्य जीवन की जिस गन्ध को अभिव्यक्त करती हैं, ‘जलसाघर’ तक आते-आते महानगरीय बोध का प्रक्षेपण करने लगती हैं या कहना चाहिए, शहरीकृत अमानवीयता के ख़िलाफ़ एक संवेदनात्मक बयान में बदल जाती हैं। इतना ही नहीं, उनके दायरे में शोषित-उत्पीड़ित और बर्बरता के आतंक में जीती पूरी-की-पूरी दुनिया सिमट आती है।
कहने की ज़रूरत नहीं कि श्रीकान्त वर्मा की कविताओं से अभिव्यक्त होता हुआ यथार्थ हमें अनेक स्तरों पर प्रभावित करता है और उनके अन्तिम कविता-संग्रह ‘मगध’ तक पहुँचकर वर्तमान शासकवर्ग के त्रास और उसके तमाच्छन्न भविष्य को भी रेखांकित कर जाता है। Shrikant varma ka kavita-sansar unke panch kavita-sangrhon—‘bhatka megh’ (1957), ‘dinarambh’ (1967), ‘maya darpan’ (1967), ‘jalsaghar’ (1973) aur ‘magadh’ (1984) mein phaila hua hai. Yahan inhin se in kavitaon ka chayan kiya gaya hai. In kavitaon se gujarte hue lagega ki kavi mein aadyant apne parivesh aur use jhelte manushya ke prati gahra lagav hai. Uske aatmgaurav aur bhavishya ko lekar vah lagatar chintit hai. Usmen yadi parampra ka svikar hai to use todne aur badalne ki bechaini bhi kam nahin hai. Shuru mein uski kavitayen apni zamin aur gramya jivan ki jis gandh ko abhivyakt karti hain, ‘jalsaghar’ tak aate-ate mahanagriy bodh ka prakshepan karne lagti hain ya kahna chahiye, shahrikrit amanviyta ke khilaf ek sanvednatmak bayan mein badal jati hain. Itna hi nahin, unke dayre mein shoshit-utpidit aur barbarta ke aatank mein jiti puri-ki-puri duniya simat aati hai. Kahne ki zarurat nahin ki shrikant varma ki kavitaon se abhivyakt hota hua yatharth hamein anek stron par prbhavit karta hai aur unke antim kavita-sangrah ‘magadh’ tak pahunchakar vartman shasakvarg ke tras aur uske tamachchhann bhavishya ko bhi rekhankit kar jata hai.