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Pratinidhi Kavitayen : Mangalesh Dabral (Paperback)

Mangalesh Dabral

Rs. 99

आलोकधन्वा कहते हैं कि ‘मंगलेश फूल की तरह नाज़ुक और पवित्र हैं।’ निश्चय ही स्वभाव की सचाई, कोमलता, संजीदगी, निस्पृहता और युयुत्सा उन्हें अपनी जड़ों से हासिल हुई है, पर इन मूल्यों को उन्होंने अपनी प्रतिश्रुति से अक्षुण्ण रखा है। मंगलेश डबराल की काव्यानुभूति की बनावट में उनके स्वभाव की... Read More

Description

आलोकधन्वा कहते हैं कि ‘मंगलेश फूल की तरह नाज़ुक और पवित्र हैं।’ निश्चय ही स्वभाव की सचाई, कोमलता, संजीदगी, निस्पृहता और युयुत्सा उन्हें अपनी जड़ों से हासिल हुई है, पर इन मूल्यों को उन्होंने अपनी प्रतिश्रुति से अक्षुण्ण रखा है।
मंगलेश डबराल की काव्यानुभूति की बनावट में उनके स्वभाव की केन्द्रीय भूमिका है। उनके अन्दाज़े-बयाँ में संकोच, मर्यादा और करुणा की एक लर्ज़िश है। एक आक्रामक, वाचाल और लालची समय में उन्होंने सफलता नहीं, सार्थकता को स्पृहणीय माना है और जब उनका मन्तव्य यह हो कि मनुष्य होना सबसे बड़ी सार्थकता है, तो ऐसा नहीं कि यह कोई आसान मकसद है, बल्कि सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि यह आसानी कितनी दुश्वार है। Aalokdhanva kahte hain ki ‘manglesh phul ki tarah nazuk aur pavitr hain. ’ nishchay hi svbhav ki sachai, komalta, sanjidgi, nisprihta aur yuyutsa unhen apni jadon se hasil hui hai, par in mulyon ko unhonne apni pratishruti se akshunn rakha hai. Manglesh dabral ki kavyanubhuti ki banavat mein unke svbhav ki kendriy bhumika hai. Unke andaze-bayan mein sankoch, maryada aur karuna ki ek larzish hai. Ek aakramak, vachal aur lalchi samay mein unhonne saphalta nahin, sarthakta ko sprihniy mana hai aur jab unka mantavya ye ho ki manushya hona sabse badi sarthakta hai, to aisa nahin ki ye koi aasan maksad hai, balki sahaj hi anuman kiya ja sakta hai ki ye aasani kitni dushvar hai.