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Pratinidhi Kavitayen : Bhagwat Ravat

Bhagwat Rawat

Rs. 75

भगवत रावत की काव्य-चिन्ता के मूल में बदलाव के लिए बेचैनी और अकुलाहट है। इसीलिए उनकी कविता में संवादधर्मिता की मुद्राएँ सर्वत्र व्याप्त हैं, जो उनके उत्तरवर्ती लेखन में क्रमश: सम्बोधन-शैली में बदल गई हैं। पर उनकी कविता में कहीं भी नकचढ़ापन, नकार, मसीही अन्दाज़ और क्रान्ति की हड़बड़ी नहीं... Read More

Description

भगवत रावत की काव्य-चिन्ता के मूल में बदलाव के लिए बेचैनी और अकुलाहट है। इसीलिए उनकी कविता में संवादधर्मिता की मुद्राएँ सर्वत्र व्याप्त हैं, जो उनके उत्तरवर्ती लेखन में क्रमश: सम्बोधन-शैली में बदल गई हैं। पर उनकी कविता में कहीं भी नकचढ़ापन, नकार, मसीही अन्दाज़ और क्रान्ति की हड़बड़ी नहीं दिखाई देती।
भगवत रावत शुरू से अन्त तक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि के रूप में सामने आते हैं। सोवियत संघ के विघटन के बावजूद मार्क्सवाद के प्रति उनकी आस्था और विश्वास खंडित नहीं हुआ। हाँ, उनका यह मत ज़रूर था कि अगर विचारधारा मैली हो गई है तो पूरी निर्ममता के साथ उसकी सफ़ाई करो। मैल जमने मत दो।
भगवत रावत को सबसे ज़्यादा विश्वास ‘लोक’ में है। उनकी कविताओं से गुज़रते हुए आपको लगेगा कि इस कवि का लोक से नाभिनाल रिश्ता है। लेकिन उनकी कविता लोक से सिर्फ़ हमदर्दी, सहानुभूति, दया, कृपा-भाव पाने के लिए नहीं जुड़ती, बल्कि इसके उलट वह लोक की ताक़त और उसके स्वाभिमान को जगह-जगह उजागर करती है। उनकी उत्तरवर्ती कविताओं को पढ़ते हुए साफ़ ज़ाहिर होता है कि उन्हें सही बात कहने से कोई रोक नहीं सकता—न दुनिया, न समाज, न व्यवस्था, न कोई ताक़तवर सत्ता-पुरुष। आज़ादी के बाद प्रगतिशील कविता के इतिहास में लोकजीवन को आवाज़ देने और उसके हक़ की लड़ाई लड़नेवाले कवियों को जब याद किया जाएगा तो भगवत की कविताएँ हमें बहुत प्यार से पास बुलाएगी और कहेगी—‘आओ, बैठो, बोलो तुम्हें क्या चाहिए।’ Bhagvat ravat ki kavya-chinta ke mul mein badlav ke liye bechaini aur akulahat hai. Isiliye unki kavita mein sanvaddharmita ki mudrayen sarvatr vyapt hain, jo unke uttarvarti lekhan mein krmash: sambodhan-shaili mein badal gai hain. Par unki kavita mein kahin bhi nakachdhapan, nakar, masihi andaz aur kranti ki hadabdi nahin dikhai deti. Bhagvat ravat shuru se ant tak pratibaddh marksvadi kavi ke rup mein samne aate hain. Soviyat sangh ke vightan ke bavjud marksvad ke prati unki aastha aur vishvas khandit nahin hua. Han, unka ye mat zarur tha ki agar vichardhara maili ho gai hai to puri nirmamta ke saath uski safai karo. Mail jamne mat do.
Bhagvat ravat ko sabse zyada vishvas ‘lok’ mein hai. Unki kavitaon se guzarte hue aapko lagega ki is kavi ka lok se nabhinal rishta hai. Lekin unki kavita lok se sirf hamdardi, sahanubhuti, daya, kripa-bhav pane ke liye nahin judti, balki iske ulat vah lok ki taqat aur uske svabhiman ko jagah-jagah ujagar karti hai. Unki uttarvarti kavitaon ko padhte hue saaf zahir hota hai ki unhen sahi baat kahne se koi rok nahin sakta—na duniya, na samaj, na vyvastha, na koi taqatvar satta-purush. Aazadi ke baad pragatishil kavita ke itihas mein lokjivan ko aavaz dene aur uske haq ki ladai ladnevale kaviyon ko jab yaad kiya jayega to bhagvat ki kavitayen hamein bahut pyar se paas bulayegi aur kahegi—‘ao, baitho, bolo tumhein kya chahiye. ’

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