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Pratinidhi kavitayen : Arun Kamal

Arun Kamal

Rs. 75

अरुण कमल की कविता का उर्वर प्रदेश लगभग पाँच दशकों में फैला हुआ है। अरुण कमल की कविता में उस अभिनव काव्य-सम्भावना का आद्यक्षर और उसका पूरा ककहरा दिखाई पड़ता है, जिससे हिन्दी कविता का नया चेहरा आकार लेता प्रतीत होता है। अरुण कमल की कविता की बहुत बड़ी विशेषज्ञता... Read More

Description

अरुण कमल की कविता का उर्वर प्रदेश लगभग पाँच दशकों में फैला हुआ है। अरुण कमल की कविता में उस अभिनव काव्य-सम्भावना का आद्यक्षर और उसका पूरा ककहरा दिखाई पड़ता है, जिससे हिन्दी कविता का नया चेहरा आकार लेता प्रतीत होता है। अरुण कमल की कविता की बहुत बड़ी विशेषज्ञता वह अपनत्व है जो बहुत हद तक उनके व्यक्तित्व का ही हिस्सा है। उनकी कविताओं से होकर गुज़रना एक अत्यन्त आत्मीय स्वजन
के साथ एक अविस्मरणीय यात्रा है। अरुण कमल की कविताएँ एक साथ अनुभवजन्य हैं और अनुभवसुलभ। अनछुए बिम्ब, अभिन्न पर कुछ अलग से, अरुण कमल के काव्य-जगत में सहज ही ध्यान खींचते हैं और अपने समकालीनों में उन्हें एक अलग पहचान देते हैं। अरुण कमल की सबसे सधी कविताओं में अनन्य अर्थगौरव और अनुगूँज है। यह अर्थगुरुता या अर्थगहनता जिससे कविता पन्ने पर जहाँ ख़त्म होती है, वहाँ ख़त्म नहीं होती बल्कि अपने अर्थ और असर की अनुगूँजों से पढ़ने, सुननेवालों के मन-मानस में अपने को फिर से सृजित करती है। कवि का सतत सृजन-कर्म उसकी इसी अप्रतिहत विकास-यात्रा के प्रति आश्वस्त करता है। Arun kamal ki kavita ka urvar prdesh lagbhag panch dashkon mein phaila hua hai. Arun kamal ki kavita mein us abhinav kavya-sambhavna ka aadyakshar aur uska pura kakahra dikhai padta hai, jisse hindi kavita ka naya chehra aakar leta prtit hota hai. Arun kamal ki kavita ki bahut badi visheshagyta vah apnatv hai jo bahut had tak unke vyaktitv ka hi hissa hai. Unki kavitaon se hokar guzarna ek atyant aatmiy svjanKe saath ek avismarniy yatra hai. Arun kamal ki kavitayen ek saath anubhavjanya hain aur anubhavasulabh. Anachhue bimb, abhinn par kuchh alag se, arun kamal ke kavya-jagat mein sahaj hi dhyan khinchte hain aur apne samkalinon mein unhen ek alag pahchan dete hain. Arun kamal ki sabse sadhi kavitaon mein ananya arthgaurav aur anugunj hai. Ye arthaguruta ya arthagahanta jisse kavita panne par jahan khatm hoti hai, vahan khatm nahin hoti balki apne arth aur asar ki anugunjon se padhne, sunnevalon ke man-manas mein apne ko phir se srijit karti hai. Kavi ka satat srijan-karm uski isi apratihat vikas-yatra ke prati aashvast karta hai.