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Pratinidhi Kahaniyan : Shani

Shani

Rs. 195 Rs. 174

शानी हिन्‍दी साहित्‍य के एक विरल कथाकार हैं। अनछुए-अनदेखे यथार्थ को एक बड़े कैनवस पर रचने के लिए शानी के पास जो विज़न था, वह विघटन के इस दौर में आज भी उतना ही महत्‍त्‍वपूर्ण है। उसे प्रस्‍तुत संग्रह की इन प्रतिनिध कहानियों में भी साफ़ देखा जा सकता है।... Read More

Description

शानी हिन्‍दी साहित्‍य के एक विरल कथाकार हैं। अनछुए-अनदेखे यथार्थ को एक बड़े कैनवस पर रचने के लिए शानी के पास जो विज़न था, वह विघटन के इस दौर में आज भी उतना ही महत्‍त्‍वपूर्ण है। उसे प्रस्‍तुत संग्रह की इन प्रतिनिध कहानियों में भी साफ़ देखा जा सकता है। एक तरफ़ उन्होंने 'जनाजा', 'युद्ध', 'जली हुई रस्सी', सरीखी रचनाओं के ज़रिए विभाजन के बाद से अपने में चन्द मुस्लिम समाज के बहुत सारे डर, असमंजस और विरोधाभास हमारे सामने रखे हैं, तो दूसरी ओर 'जहाँपनाह जंगल' जैसी दुनिया उद्‌घाटित की है और 'परस्त्रीगमन' जैसा नजरिया पेश किया है। उनकी कहानियों में हमें अपने भीतर की वह दबी हुई चीख़ सुनाई पड़ती है, जिसे हम रोज़ मुल्लवी करते चलते थे। साथ ही, उनकी दूरबीनी नज़र के सामने हम अपने कार्यकलापों को बौना, व्यर्थ और क्षणभंगुर होता हुआ भी पाते हैं। संक्षेप में, उनके पाठकों को कहीं छुटकारा नहीं है—हर हालत में वे पात्रों की नियति के सहभोगी हैं—उसमें विद्रूप हो, व्यंग्‍य हो या कभी न भुलाया जानेवाला अपमान।
शानी के रचना-संसार से अपरिचित पाठकों के लिए यह संकलन यक़ीनन प्रतिनिधि सिद्ध होगा। Shani hin‍di sahit‍ya ke ek viral kathakar hain. Anachhue-andekhe yatharth ko ek bade kainvas par rachne ke liye shani ke paas jo vizan tha, vah vightan ke is daur mein aaj bhi utna hi mahat‍‍vapurn hai. Use pras‍tut sangrah ki in pratinidh kahaniyon mein bhi saaf dekha ja sakta hai. Ek taraf unhonne janaja, yuddh, jali hui rassi, sarikhi rachnaon ke zariye vibhajan ke baad se apne mein chand muslim samaj ke bahut sare dar, asmanjas aur virodhabhas hamare samne rakhe hain, to dusri or jahanpanah jangal jaisi duniya ud‌ghatit ki hai aur parastrigman jaisa najariya pesh kiya hai. Unki kahaniyon mein hamein apne bhitar ki vah dabi hui chikh sunai padti hai, jise hum roz mullvi karte chalte the. Saath hi, unki durbini nazar ke samne hum apne karyaklapon ko bauna, vyarth aur kshanbhangur hota hua bhi pate hain. Sankshep mein, unke pathkon ko kahin chhutkara nahin hai—har halat mein ve patron ki niyati ke sahbhogi hain—usmen vidrup ho, vyang‍ya ho ya kabhi na bhulaya janevala apman. Shani ke rachna-sansar se aparichit pathkon ke liye ye sanklan yaqinan pratinidhi siddh hoga.