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Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg

Mridula Garg

Rs. 150 Rs. 134

‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित मृदुला गर्ग का कथा-संसार विविधता के अछोर तक फैला हुआ है। उनकी कहानियाँ मनुष्य के सारे सरोकारों से गहरे तक जुड़ी हुई हैं। समाज, देश, राजनीतिक माहौल, सामाजिक वर्जनाओं, पर्यावरण से लेकर मानव मन की रेशे-रेशे पड़ताल करती नज़र आती हैं। इस संकलन की कहानियाँ... Read More

Description

‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित मृदुला गर्ग का कथा-संसार विविधता के अछोर तक फैला हुआ है। उनकी कहानियाँ मनुष्य के सारे सरोकारों से गहरे तक जुड़ी हुई हैं। समाज, देश, राजनीतिक माहौल, सामाजिक वर्जनाओं, पर्यावरण से लेकर मानव मन की रेशे-रेशे पड़ताल करती नज़र आती हैं। इस संकलन की कहानियाँ अपने इसी ‘मूड’ या मिज़ाज के साथ प्रस्तुत हुई हैं।
मृदुला गर्ग की कहानियाँ पाठक के लिए इतना ‘स्पेस’ देती हैं कि आप लेखक को गाइड बना तिलिस्म में नहीं उतर सकते, इसे आपको अपने अनुसार ही हल करना पड़ता है। यही कारण है कि बने-बनाए फ़ॉरमेट या ढर्रे से, ऊबे बग़ैर, आप पूरी रोचकता, कौतूहल और दार्शनिक निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं। गलदश्रुता के लिए जगह न होते हुए भी आपकी आँखें कब नम हो जाएँ, यह आपके पाठकीय चौकन्ने पर निर्भर करता है। यही मृदुला गर्ग की क़िस्सागोई का कौशल या कमाल है, जहाँ लिजलिजी भावुकता बेशक नहीं मिलेगी, पर भावना और संवेदना की गहरी घाटियाँ मौजूद हैं, एक बौद्धिक विवेचन के साथ।
—दिनेश द्विवेदी ‘sahitya akademi puraskar’ se sammanit mridula garg ka katha-sansar vividhta ke achhor tak phaila hua hai. Unki kahaniyan manushya ke sare sarokaron se gahre tak judi hui hain. Samaj, desh, rajnitik mahaul, samajik varjnaon, paryavran se lekar manav man ki reshe-reshe padtal karti nazar aati hain. Is sanklan ki kahaniyan apne isi ‘mud’ ya mizaj ke saath prastut hui hain. Mridula garg ki kahaniyan pathak ke liye itna ‘spes’ deti hain ki aap lekhak ko gaid bana tilism mein nahin utar sakte, ise aapko apne anusar hi hal karna padta hai. Yahi karan hai ki bane-banaye faurmet ya dharre se, uube bagair, aap puri rochakta, kautuhal aur darshnik nishkarsh tak pahunch sakte hain. Galdashruta ke liye jagah na hote hue bhi aapki aankhen kab nam ho jayen, ye aapke pathkiy chaukanne par nirbhar karta hai. Yahi mridula garg ki qissagoi ka kaushal ya kamal hai, jahan lijaliji bhavukta beshak nahin milegi, par bhavna aur sanvedna ki gahri ghatiyan maujud hain, ek bauddhik vivechan ke saath.
—dinesh dvivedi

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