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Pratinidhi Kahaniyan : Geetanjali Shree

Geetanjali Shree

Rs. 99 – Rs. 195

यह गीतांजलि श्री की कहानियों का प्रतिनिधि संचयन है। गीतांजलि की लगभग हर कहानी अपनी टोन की कहानी है और विचलन उनके यहाँ लगभग नहीं के बराबर है और यह बात अपने आपमें आश्चर्यजनक है क्योंकि बड़े-से-बड़े लेखक कई बार बाहरी दबावों और वक़्ती ज़रूरतों के चलते अपनी मूल टोन... Read More

Description

यह गीतांजलि श्री की कहानियों का प्रतिनिधि संचयन है। गीतांजलि की लगभग हर कहानी अपनी टोन की कहानी है और विचलन उनके यहाँ लगभग नहीं के बराबर है और यह बात अपने आपमें आश्चर्यजनक है क्योंकि बड़े-से-बड़े लेखक कई बार बाहरी दबावों और वक़्ती ज़रूरतों के चलते अपनी मूल टोन से विचलित हुए हैं। यह अच्छी बात है कि गीतांजलि श्री ने अपनी लगभग हर कहानी में अपनी सिग्नेचर ट्यून को बरकरार रखा है। लेकिन सवाल यह है कि गीतांजलि की कहानियों की यह मूल टोन आख़िर है क्या? एक अजीब तरह का फक्कड़पन, एक अजीब तरह की दार्शनिकता, एक अजीब तरह की भाषा और एक अजीब तरह की रवानी। लेकिन ये सारी अजीबियतें ही उनके कथाकार को एक व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि यह सब परम्परा से हटकर है और परम्परा में समाहित भी। Ye gitanjali shri ki kahaniyon ka pratinidhi sanchyan hai. Gitanjali ki lagbhag har kahani apni ton ki kahani hai aur vichlan unke yahan lagbhag nahin ke barabar hai aur ye baat apne aapmen aashcharyajnak hai kyonki bade-se-bade lekhak kai baar bahri dabavon aur vakti zarurton ke chalte apni mul ton se vichlit hue hain. Ye achchhi baat hai ki gitanjali shri ne apni lagbhag har kahani mein apni signechar tyun ko barakrar rakha hai. Lekin saval ye hai ki gitanjali ki kahaniyon ki ye mul ton aakhir hai kya? ek ajib tarah ka phakkadpan, ek ajib tarah ki darshanikta, ek ajib tarah ki bhasha aur ek ajib tarah ki ravani. Lekin ye sari ajibiyten hi unke kathakar ko ek vyaktitv prdan karti hain. Yahan ye kahna zaruri hai ki ye sab parampra se hatkar hai aur parampra mein samahit bhi.

Additional Information
Book Type

Paperback, Hardbound

Publisher Rajkamal Prakashan
Language Hindi
ISBN 978-8126718696
Pages 164p
Publishing Year

Pratinidhi Kahaniyan : Geetanjali Shree

यह गीतांजलि श्री की कहानियों का प्रतिनिधि संचयन है। गीतांजलि की लगभग हर कहानी अपनी टोन की कहानी है और विचलन उनके यहाँ लगभग नहीं के बराबर है और यह बात अपने आपमें आश्चर्यजनक है क्योंकि बड़े-से-बड़े लेखक कई बार बाहरी दबावों और वक़्ती ज़रूरतों के चलते अपनी मूल टोन से विचलित हुए हैं। यह अच्छी बात है कि गीतांजलि श्री ने अपनी लगभग हर कहानी में अपनी सिग्नेचर ट्यून को बरकरार रखा है। लेकिन सवाल यह है कि गीतांजलि की कहानियों की यह मूल टोन आख़िर है क्या? एक अजीब तरह का फक्कड़पन, एक अजीब तरह की दार्शनिकता, एक अजीब तरह की भाषा और एक अजीब तरह की रवानी। लेकिन ये सारी अजीबियतें ही उनके कथाकार को एक व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि यह सब परम्परा से हटकर है और परम्परा में समाहित भी। Ye gitanjali shri ki kahaniyon ka pratinidhi sanchyan hai. Gitanjali ki lagbhag har kahani apni ton ki kahani hai aur vichlan unke yahan lagbhag nahin ke barabar hai aur ye baat apne aapmen aashcharyajnak hai kyonki bade-se-bade lekhak kai baar bahri dabavon aur vakti zarurton ke chalte apni mul ton se vichlit hue hain. Ye achchhi baat hai ki gitanjali shri ne apni lagbhag har kahani mein apni signechar tyun ko barakrar rakha hai. Lekin saval ye hai ki gitanjali ki kahaniyon ki ye mul ton aakhir hai kya? ek ajib tarah ka phakkadpan, ek ajib tarah ki darshanikta, ek ajib tarah ki bhasha aur ek ajib tarah ki ravani. Lekin ye sari ajibiyten hi unke kathakar ko ek vyaktitv prdan karti hain. Yahan ye kahna zaruri hai ki ye sab parampra se hatkar hai aur parampra mein samahit bhi.