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Pratinidhi Kahaniyan : Arun Prakash

Arun Prakash

Rs. 60

साहित्य के मौजूदा दौर में पाठ-सुख वाली कहानियाँ कम होती जा रही हैं। इस संकलन की कहानियों में पाठ-सुख भरपूर है। लेकिन यह सुख तात्कालिक नहीं है बल्कि ये निर्विवाद कहानियाँ देर तक स्मृति में बनी रहती हैं। लोकप्रियता और विचार-केन्द्रित कथा का मिज़ाज मुश्किल से मिलता है, पर इन... Read More

Description

साहित्य के मौजूदा दौर में पाठ-सुख वाली कहानियाँ कम होती जा रही हैं। इस संकलन की कहानियों में पाठ-सुख भरपूर है। लेकिन यह सुख तात्कालिक नहीं है बल्कि ये निर्विवाद कहानियाँ देर तक स्मृति में बनी रहती हैं।
लोकप्रियता और विचार-केन्द्रित कथा का मिज़ाज मुश्किल से मिलता है, पर इन कहानियों में यह सुमेल इसलिए सम्भव हो पाया, क्योंकि यहाँ पाठकों के प्रति गम्भीर सम्मान है। ये कहानियाँ पाठकों को उपभोक्ता नहीं, सहभोक्ता; श्रोता नहीं, संवादक बनने का अवसर देती हैं। इनमें विचार उपलाता नहीं, अन्तर्धारा की तरह बहता है, क्योंकि यह सृजन पाठक-लेखक सहभागिता पर टिका है।
युग की प्रमुख आवाज़ों को सुरक्षित रखना इतिहास की ज़‍िम्मेवारी है, छोटी-छोटी अनुगूँजों को सहेजना साहित्य की। मनुष्य विरोधी मूल्यों, सत्ताओं और संगठित संघर्षों की बड़ी उपस्थिति के बावजूद लघु, असंगठित और प्राय: व्यक्तिगत संघर्षों की बड़ी दुनिया है। इन कहानियों में उसी की अनुगूँजें हैं।
ये कहानियाँ किसी एक शैली में नहीं बँधी हैं, बल्कि हर कहानी का अलग और स्वतंत्र व्यक्तित्व नई भाषा, नई संरचना और आन्तरिक गतिशीलता के सहारे निर्मित किया गया है। Sahitya ke maujuda daur mein path-sukh vali kahaniyan kam hoti ja rahi hain. Is sanklan ki kahaniyon mein path-sukh bharpur hai. Lekin ye sukh tatkalik nahin hai balki ye nirvivad kahaniyan der tak smriti mein bani rahti hain. Lokapriyta aur vichar-kendrit katha ka mizaj mushkil se milta hai, par in kahaniyon mein ye sumel isaliye sambhav ho paya, kyonki yahan pathkon ke prati gambhir samman hai. Ye kahaniyan pathkon ko upbhokta nahin, sahbhokta; shrota nahin, sanvadak banne ka avsar deti hain. Inmen vichar uplata nahin, antardhara ki tarah bahta hai, kyonki ye srijan pathak-lekhak sahbhagita par tika hai.
Yug ki prmukh aavazon ko surakshit rakhna itihas ki za‍immevari hai, chhoti-chhoti anugunjon ko sahejna sahitya ki. Manushya virodhi mulyon, sattaon aur sangthit sangharshon ki badi upasthiti ke bavjud laghu, asangthit aur pray: vyaktigat sangharshon ki badi duniya hai. In kahaniyon mein usi ki anugunjen hain.
Ye kahaniyan kisi ek shaili mein nahin bandhi hain, balki har kahani ka alag aur svtantr vyaktitv nai bhasha, nai sanrachna aur aantrik gatishilta ke sahare nirmit kiya gaya hai.